दिल्ली में चार अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान एक बहुत दिलचस्प तस्वीर (नीचे) देखने को मिली. इसमें एक लड़की पुलिस की हिरासत से बचने के लिए टूटे कांच वाली बस की खिड़की से बाहर कूद रही है. कमाल की बात यह है कि ऐसा करते हुए वह ज़मीन की तरफ़ नहीं देख रही. तस्वीर में साफ़ दिखता है कि पीठ के बल गिरती हुई इस लड़की को पकड़ने के लिए जो हाथ उठे हैं, वे सारे पुरुषों के हैं. इसे देखना आश्चर्य के साथ खुशी और उम्मीद भी देता है. क्योंकि हम जिस दुनिया के आदी हैं, उसमें किसी महिला के आसपास इतने हाथों का होना आम तौर पर अनिष्ट का ही इशारा होता है. इस तस्वीर को देखकर यह जिज्ञासा भी होती है कि आख़िर वह किस तरह का विश्वास है जो एक लड़की को इस तरह से कूद जाने का साहस देता है.
इसे समझने के लिए ऐसी ही कुछ और तस्वीरों पर ग़ौर करने की ज़रूरत है. इन तस्वीरों में महिलाएं सड़कों पर धरना दे रही हैं, रास्ता रोक रही हैं, पुलिस की बैरिकेडिंग पर चढ़ रही हैं, हिरासत में ली जा रही हैं, फिर-फिर लौटकर वापस आ रही हैं और मुट्ठी बंद करके नारे लगा रही हैं. ऐसा करते हुए कभी उनके कपड़े फटते हैं, बाल बिखरते हैं, चप्पलें खो जाती हैं या ऐसी-ऐसी भंगिमाओं में उनकी तस्वीरें बाहर आती हैं जिन्हें कहीं से भी ‘लेडीलाइक’ नहीं कहा जा सकता है. पुरुषों की इस तरह की तस्वीरें लगभग हर प्रतिरोध के वक्त देखने को मिलती रही हैं. लेकिन महिलाओं की, वह भी इतनी बड़ी संख्या में, बीते कुछ समय में ही दिखी हैं.
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महिलाओं को बचपन से ही सिखाया जाता है कि उन्हें दूसरों के सामने किस तरह से दिखना, बैठना, चलना, हंसना, यहां तक कि कैसे गुस्सा करना और रोना है. लेकिन इन प्रदर्शनों में शामिल महिलाएं इस बात से बेपरवाह हैं. उनका ध्यान तस्वीरों या वीडियोज़ में सुंदर या सलीकेदार दिखने में नहीं, उस काम पर है जो वे कर रही हैं. यह भी एक किस्म की आज़ादी है जिसकी उतनी चर्चा नहीं होती.
पहली नज़र में यह अचानक आया कोई बदलाव लगता है. लेकिन थोड़ा सोचें तो समझ आएगा कि इसकी ज़मीन बीते कुछ सालों से तैयार हो रही थी. भारतीय महिलाओं ने पहले भी चिपको और नर्मदा आंदोलन सरीखी कई बड़ी लड़ाइयां लड़ी हैं. लेकिन हाल के वर्षों में तरह-तरह के राजनीतिक प्रतिरोधों में उनकी सक्रियता कई नई तस्वीरें हमारे सामने रख रही है.
दिसंबर 2019 में जब औरतें शाहीन बाग में प्रदर्शन के लिए जुटीं तो शायद ही किसी को अंदाज़ा रहा होगा कि वह पूरे 101 दिनों तक चल जाएगा. अगर कोविड न हुआ होता तो वे शायद इतने ही दिनों तक और डटी रह सकती थीं. यहां पर मुस्लिम महिलाएं नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) के खिलाफ अपनी बात रख रही थीं. आम तौर पर घर संभालने वाली ये औरतें पहली बार किसी ऐसे काम के लिए घर से बाहर थीं जिसका उनके घर, पति या बच्चों से बिलकुल सीधा वास्ता नहीं था. इस प्रदर्शन ने साफ़ किया कि ये औरतें एक नागरिक के तौर पर भी घर से बाहर निकल सकती हैं और किसी राजनीतिक मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज करवा सकती हैं.
कमाल की बात यह थी कि उन्होंने इसे उसी सुघड़ता के साथ किया जिससे वे अब तक अपनी गृहस्थियां चलाती आ रही थीं. सर्द रातों में भी उनका धरना चलता रहा. वहां खाना बनता था, बच्चे पढ़ते थे, गीत गाए जाते थे और संविधान पर बहसें होती थीं.
विरोध के इस सिलसिले को किसान आंदोलन में शामिल महिलाओं ने आगे बढ़ाया. एक साल से भी ज्यादा चले इस आंदोलन में वे पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के गांवों से आकर दिल्ली की सीमाओं पर डट गईं. शाहीन बाग की ही तरह, यहां भी एक बड़ी संख्या में उम्रदराज़, कम पढ़ी-लिखी या अनपढ़ महिलाएं थीं जो पहली बार इस तरह बाहर निकली थीं. वे ट्रैक्टरों पर बैठकर आईं, तम्बुओं में रहीं, आंदोलन को संभालने में लगी रहीं. यहां आकर उन्होंने भारतीय मानस में किसान के नाम पर बनने वाली ‘हल लेकर जाते पुरुष’ की छवि में थोड़ा सा ही सही, ख़ुद को भी जोड़ दिया.
शाहीन बाग और किसान आंदोलन के बाद हुए प्रदर्शनों को देखें तो उनमें तीन बदलाव ख़ास तौर पर नज़र आते हैं. पहला, महिलाओं ने अपने शरीर को बचाकर रखी जाने वाली चीज़ मानने से इनकार कर दिया है और अब वे असुविधा और जोखिम वाली जगहों पर जाने से कतराती नहीं हैं. दूसरा, उन्होंने घर से बाहर रहने की समय सीमा को भी तोड़ दिया है. यानी, अब वे लंबे समय तक दिन-रात देखे बग़ैर किसी आंदोलन में मौजूद रह सकती हैं. और तीसरा बदलाव, जो शायद सबसे ज़रूरी है: उनके प्रतिरोध का मुद्दा अब महिलाओं से ही जुड़ा हो, यह ज़रूरी नहीं है. वे अब देश-समाज से जुड़े हर ज़रूरी सवाल पर बोल और लड़ सकती हैं.
महिला पहलवानों का प्रदर्शन, एलएसआर समेत कई कॉलेजों के कैंपसों में हुए विरोध प्रदर्शन, जेन-ज़ी और चिता आंदोलन इन बदलावों के उदाहरण हैं. अब किसी भी किस्म की अगर-मगर इन महिलाओं के सार्वजनिक जीवन की सीमाएं तय करती नहीं दिखती.
इस दौरान महिलाओं ने ‘वल्नरेबिलिटी’ से ‘एजेंसी’ तक का सफ़र किया है. जेन-ज़ी आंदोलन के दौरान यह भी देखने को मिला कि औरतों ने कैसे खुद को प्रतिरोध के साथ-साथ अपने पुरुष साथियों के बचाव का साधन भी बनाया. चाहे वह मुंबई की रिया अहीर हो जो प्रदर्शनकारियों को छुड़ाने के लिए पुलिस की गाड़ी के सामने आ गई थी या फिर वे लड़कियां जो दिल्ली पुलिस की लाठियों से अपने दोस्तों को बचाने के लिए उनकी ढाल बन गईं.
यानी प्रतिरोध की इन जगहों पर महिलाओं और पुरुषों के बीच भरोसे का एक नया रिश्ता भी बन रहा है. ऐसा रिश्ता जिसमें न कोई हमेशा रक्षक है और न कोई हमेशा रक्षित. जब ज़रूरत हुई लड़कियां आगे आ गईं और जब ज़रूरत पड़ी लड़कों ने अपने हाथ आगे बढ़ाकर उन्हें थाम लिया.
लेकिन इन आंदोलनों में लड़कियों को एक-दूसरे से मिलने वाला भरोसा भी कम कीमती नहीं है. वे सिर्फ अपने भीतर मौजूद साहस को लेकर ही इनमें नहीं आ रही हैं, एक-दूसरे के साथ रहकर नया साहस भी पा रही हैं. पुलिस किसी एक को पकड़ती है तो दूसरी उसे छुड़ाने के लिए आगे आ जाती है. कोई पुलिसवाला किसी लड़की को छूता है तो बाकी शेरनियों की तरह उस पर गुर्राती हैं. कोई गिरती है तो दूसरी उसे उठाती हैं. कोई नारा शुरू करती है तो बाकी उसकी आवाज़ बन जाती हैं. और फिर सब मिलकर पूरी रात धरने पर बैठ जाती हैं.
ये महिलाएं ख़ुद से परंपरागत ‘शालीनता’ और ‘मर्यादा’ की उम्मीदें रखने वालों का अब लिहाज़ नहीं कर रही हैं. बल्कि प्रदर्शनों में उन्होंने यह तय करने का हक अपने पास ही रखा है कि वे कब, किससे, किस लहजे में बात करेंगी. छात्र नेता नेहा बोरा की तमाम तस्वीरें बताती हैं कि उन्होंने ‘लेडीलाइक’ दिखने के साथ-साथ हर हालत में महिलाओं के कम, धीरे और मीठा ही बोलने को अब अनिवार्यता के दायरे से बाहर फेंक दिया है.
यानी अब वे सिर्फ विरोध करने की आज़ादी ही नहीं ले रही हैं, बल्कि उस विरोध का तरीका भी खुद चुन रही हैं. उनका तरीका ‘वास्तेगनाहुइयां’ पर रील हो सकता है, ‘एक कचोरी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा’ जैसे नारे भी हो सकते हैं या फिर मीडिया या पुलिस के सामने की गई कोई तीखी-कड़वी टिप्पणी.
शायद यही वजह है कि उनके प्रतिरोध पर होने वाली प्रतिक्रियाओं में एक खास तरह की असहजता और तीव्रता दिखाई देती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश की ‘बेटियों’ की भाषा सुनकर ‘कल्चरल शॉक’ लगने वाली टिप्पणी, सत्ता समर्थकों द्वारा कुछ महिला प्रदर्शनकारियों की ‘डॉक्सिंग’ की कोशिशें, ऑनलाइन गालियां और धमकियां इसी व्यवहार के अलग-अलग रूप हैं. इन सबके बीच दिल्ली पुलिस की लाठियां और उसके कुछ जवानों पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप भी हैं. महिलाओं का विरोध करना ही कुछ लोगों को असहज करता है, और यहां तो वे बेखौफ और बेलौस भी हैं. उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे विरोध करें तो भी बुरा न लगे. गुस्सा करें तो भी अच्छा लगे. लेकिन परेशानी यह है कि अब वे दूसरों की नज़र में अपनी छवि के बजाय अपनी नज़र में खुद की छवि को महत्व दे रही हैं.
अब लड़ाई औरतों के सड़क पर आने और अपनी बात कहने की आज़ादी पाने भर की नहीं है, बतौर नागरिक पहचाने जाने की भी है. इन तस्वीरों में शामिल महिलाएं किसी पुरुष की रिश्तेदार नहीं, किसी परिवार की प्रतिनिधि नहीं और सिर्फ अपने साथ हुई ज्यादती की शिकायत करने वाली पीड़िता भी नहीं हैं. वे भी नागरिक हैं और सरकार, कानून और संस्थाओं से सवाल करने का उतना ही अधिकार रखती हैं जितना कोई पुरुष.
आज़ादी की यह मुनादी इन आंदोलनों का हासिल है और इनकी शक्ति भी. इनमें शामिल महिलाएं पूरा ज़ोर लगाकर कह रही हैं कि जब फैसले लिए जाएंगे तो उनमें हमारी आवाज़ भी शामिल होगी.
आज़ादी हमेशा किसी कानून के बदलने या किसी के इजाज़त देने से नहीं मिलती. कई बार वह उस दिन से शुरू हो जाती है जब कोई इजाज़त मिलने का इंतज़ार करना छोड़ देता है. इन तस्वीरों में दिखाई दे रही औरतें शायद यही कर रही हैं. वे आज़ादी के लिए लड़ना छोड़ नहीं रही हैं, लेकिन उसके मिलने का इंतज़ार भी नहीं कर रही हैं.
वे अब सिर्फ आज़ादी के लिए नहीं, आज़ादी से भी लड़ाई लड़ रही हैं.
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