33 फीसदी महिला आरक्षण पर 100 फीसदी राजनीति!
अगर मोदी सरकार की नीयत साफ हो, तो महिला आरक्षण कभी भी लागू किया जा सकता है
कपिल सिब्बल
(लेखक की अनुमति से, उनके मीडिया संवाद पर आधारित)

मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल, 2026 तक चलने वाला संसद का एक विशेष सत्र बुलाया है. कहने को तो इसका मकसद ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संवैधानिक संशोधन) में बदलाव करना है, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का रास्ता साफ हो सके. लेकिन इस पूरी कवायद की टाइमिंग और कानूनी बारीकियों को देखें, तो यह महिला आरक्षण से जुड़ा कम और अगले — 2029 के — लोकसभा चुनावों से जुड़ा ज्यादा नज़र आता है.
पहला सवाल इस विशेष सत्र के समय पर ही उठता है. यह तब हो रहा है जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं. वहां 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है. ऐसे में सत्र बुलाकर सरकार विपक्षी सांसदों—खासकर टीएमसी को—इस मुश्किल में डाल रही है कि वे अपनी जनता के बीच चुनाव प्रचार करें या दिल्ली आकर संसद में वोट दें?
यह कोई अनजाने में की गई चूक नहीं, बल्कि विपक्ष को परेशान करने की सोची-समझी कोशिश है. अगर सरकार की नीयत में खोट नहीं होता, तो क्या यह काम 29 अप्रैल के बाद नहीं किया जा सकता था? जाहिर है, इसका मकसद मतदाताओं के बीच अपने पक्ष में माहौल बनाना और विपक्ष के चुनाव प्रचार में खलल डालना है.
2023 में जब 106वां संविधान संशोधन हुआ था, तो अनुच्छेद 334ए में यह साफ लिखा गया था कि महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होगा. अब सरकार अचानक अपने ही बनाए कानून से पीछे हट रही है. वह नई जनगणना का इंतजार करने के बजाय 2011 के पुराने आंकड़ों पर ही परिसीमन करना चाहती है.
ऐसा क्यों किया जा रहा है? जब देश के रजिस्ट्रार जनरल खुद कह चुके हैं कि नई जनगणना दिसंबर 2027 तक पूरी हो जाएगी, तो फिर 15 साल पुराने डेटा के आधार पर देश का राजनीतिक नक्शा क्यों बदला जा रहा है? जवाब साफ है—अपनी सुविधा के हिसाब से सीटों की सीमाओं को बदलना.
कानूनी तौर पर अनुच्छेद 334ए कहता है कि परिसीमन केवल महिला आरक्षण लागू करने के उद्देश्य के लिए ही होगा—यानी केवल यह तय करने के लिए कि कौन-सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. इसे ‘जनरल डिलिमिटेशन’ का जरिया बनाकर पूरी संसद की संरचना बदलना असंवैधानिक है.
सरकार यहां महिला सशक्तिकरण को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर रही है. जम्मू-कश्मीर और असम में हमने देख लिया है कि कैसे परिसीमन का इस्तेमाल अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया गया. मेरा स्पष्ट मानना है कि यह हमला संविधान के ‘मूल ढांचे’ पर है, जिसे कोई भी विपक्ष स्वीकार नहीं कर सकता.
इस योजना का सबसे खतरनाक पहलू भारत के संघीय ढांचे को तबाह करना है. केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया परिसीमन उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देगा.
गणित सीधा है: आज उत्तर प्रदेश में 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में 39. अगर सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती है, तो यूपी की सीटें बढ़कर 120 हो जाएंगी और तमिलनाडु केवल 59 पर सिमट जाएगा. यानी दोनों राज्यों के बीच जो अंतर पहले 41 सीटों का था, वह बढ़कर 61 हो जाएगा.
यह उन दक्षिण भारतीय राज्यों को सीधे तौर पर ‘सजा’ देना है, जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है. अमेरिका की सीनेट में हर राज्य के दो ही प्रतिनिधि होते हैं, ताकि संतुलन बना रहे. लेकिन भारत में जनसंख्या के नाम पर उत्तर भारत को फायदा पहुंचाकर दक्षिण की आवाज को दबाने की कोशिश हो रही है. यह देश की एकता के लिए घातक है.
अगर प्रधानमंत्री वास्तव में महिला आरक्षण को तुरंत लागू करना चाहते हैं, तो उन्हें किसी विशेष सत्र या पुराने डेटा वाले परिसीमन का प्रपंच रचने की जरूरत नहीं है. इसका समाधान बहुत आसान है: लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में से ही तुरंत 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दीजिए. सारा विपक्ष इस पर आपके साथ खड़ा होगा.
लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार ऐसा नहीं करेगी, क्योंकि ‘नारी शक्ति’ तो केवल एक बहाना है, असली मकसद ‘राजनीतिक शक्ति’ पर कब्जा करना है. विपक्ष को एकजुट होकर संघीय ढांचे पर इस हमले का विरोध करना चाहिए. हमें आरक्षण चाहिए, लेकिन परिसीमन की साजिशों वाली शर्तों के साथ नहीं.

