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कानून | अल्पसंख्यक

क्या भारत में मुसलमान वास्तव में अल्पसंख्यक हैं?

भारत के संविधान में अल्पसंख्यक की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और इस मामले में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून भी उतना ही अस्पष्ट है

विकास बहुगुणा | 08 जून 2021 | फोटो: फ्लिकर

‘हम अल्पसंख्यक नहीं हैं. यह शब्द अंग्रेजों ने दिया था. वे चले गए. अब इसे भी विदाई दी जाए.’

बिहार के वरिष्ठ नेता तजम्मुल हुसैन ने यह बात संविधान सभा की कार्यवाही के दौरान तब कही थी जब भविष्य के भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर बहस हो रही थी. दरअसल मद्रास से संविधान सभा में आए मोहम्मद इस्माइल जैसे कई सदस्य थे जो उनके लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था चाहते थे – यानी चुनावों में कुछ सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित कर दी जाएं. यह वह समय था जब भारी खून-खराबे के बाद भारत से अलग होकर पाकिस्तान नाम का एक नया मुल्क बन चुका था. इन सदस्यों का मानना था कि इसके चलते भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं में मुसलमानों के प्रति अविश्वास की भावना है. उन्हें लगता था कि चुनावों में मुसलमानों को अलग-अलग पार्टियों से टिकट मिल भी गए तो भी वे संसद या विधानसभाओं में नहीं पहुंच सकेंगे, जिससे राजनीतिक व्यवस्था में उनका आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं हो सकेगा.

उधर, तजम्मुल हुसैन का तर्क इसके उलट था. उनका कहना था कि सीटों में आरक्षण मुस्लिम समुदाय को पहले से भी ज्यादा अलग-थलग कर देगा जो उनके लिए घातक साबित होगा. मुसलमानों से खुद को सिर्फ भारतीय नागरिक समझने का आह्वान करते हुए उनका कहना था, ‘मैं सभी अल्पसंख्यकों से अपील करता हूं कि एक धर्मनिरेपक्ष देश बनाने के अभियान में वे बहुसंख्यकों का साथ दें.’ संविधान सभा के कई सदस्यों का इस मुद्दे पर यही रुख था. कांग्रेसी दिग्गज गोविंद वल्लभ पंत ने सभा की कार्यवाही के दौरान कहा था, ‘क्या अल्पसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यकों के रूप में ही रहना चाहते हैं? या वे भी एक दिन एक महान राष्ट्र का अभिन्न अंग बनने और उसकी नियति को निर्धारित व नियंत्रित करने का सपना देखते हैं?’

इस तरह अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन का प्रस्ताव खारिज हो गया. हालांकि संविधान निर्माताओं ने उनके संरक्षण के लिए कुछ विशेष प्रावधान रखने का फैसला किया. 26 जनवरी 1950 को जिस संविधान ने भारत को गणतंत्र बनाया उसमें अल्पसंख्यकों का जिक्र चार बार हुआ है. पहली बार अनुच्छेद 29 में जो अल्पसंख्यक वर्गों के हितों के संरक्षण की बात कहता है. दूसरी बार अनुच्छेद 30 में जिसमें कहा गया है कि सभी अल्पसंख्यकों को, चाहें वे धार्मिक हों या भाषाई, अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार होगा और किसी संस्था को मदद देने के मामले में राज्य इसलिए भेदभाव नहीं करेगा कि उसे कोई अल्पसंख्यक वर्ग चला रहा है.

अल्पसंख्यक शब्द का इस्तेमाल संविधान में तीसरी बार अनुच्छेद 350ए में हुआ है. इसमें कहा गया है, ‘हर राज्य और उसके हर स्थानीय निकाय की यह कोशिश होनी चाहिए कि वह भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के लोगों को प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर उनकी मातृभाषा में निर्देश की सुविधा दे.’ उधर, अनुच्छेद 350बी भाषाई अल्पसंख्यकों के लिये एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है. इसके मुताबिक राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त यह अधिकारी भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए बने सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करेगा और अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपेगा.

लेकिन अल्पसंख्यक कौन है, इस बारे में संविधान में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं लिखा गया. आज भले ही ज्यादातर लोगों के लिए अल्पसंख्यक का मतलब मुसलमान हो चुका है लेकिन, संविधान में इस तरह की कोई परिकल्पना नहीं थी. जैसा कि अपने एक लेख में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज़ में राजनीतिक इस्लाम के विशेषज्ञ और एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद कहते हैं, ‘दरअसल संविधान ने अल्पसंख्यक की परिकल्पना एक खुली श्रेणी के रूप में की है जिसका उद्देश्य धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक रूप से अलग विभिन्न वर्गों के हितों की सुरक्षा है.’

राजनीति विज्ञान में अल्पसंख्यक की अवधारणा 19वीं सदी के दौरान यूरोप में राष्ट्रवाद के उभार के साथ विकसित हुई. कुछ विश्लेषकों के मुताबिक भारत में यह ब्रिटिश शासन के दौरान आई जब 1899 में तत्कालीन ब्रिटिश जनगणना आयुक्त हर्बर्ट होप रिजली ने कहा कि यहां सिखों ,जैनों, बौद्धों और मुस्लिमों को छोड़कर हिंदू बहुसंख्यक हैं. माना जाता है कि यहीं से अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद के विमर्श को बल मिलने लगा.

वापस इस सवाल पर लौटते हैं कि आखिर अल्पसंख्यक किसे कहा जाना चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक अल्पसंख्यक होने का आधार अलग जातीय, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान है. इस संदर्भ में संस्था के एक अधिकारी फ्रैंसेस्को कैपटॉर्टि की उस चर्चित परिभाषा का जिक्र किया जा सकता है जो उन्होंने 1977 में दी थी. उनका कहना था, ‘अल्पसंख्यक एक ऐसे समूह को कहा जाना चाहिए जिसकी आबादी देश की बाकी आबादी की तुलना में कम हो, जिसकी क्षमता अपना प्रभुत्व रखने की न हो, जिसके सदस्य – देश के नागरिक होते हुए – ऐसी जातीय, धार्मिक और भाषाई विशेषताएं रखते हों जो बाकी आबादी से अलग हों और जो परोक्ष रूप से ही सही, एकजुटता की भावना दिखाते हों जिसका लक्ष्य अपनी संस्कृति, परंपराओं, धर्म और भाषा का संरक्षण हो.’

इस सिलसिले में देश के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद की वह बात भी याद की जा सकती है जो उन्होंने 1940 में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण के दौरान कही थी. उनका कहना था कि राजनीतिक बोल-चाल में अल्पसंख्यक का मतलब एक ऐसा कमजोर समुदाय है जो अपनी तादाद और हैसियत के चलते एक बड़े और बहुसंख्यक समुदाय की तुलना में खुद को अपनी सुरक्षा करने में अक्षम पाता है. आजाद का मानना था कि किसी समुदाय को अल्पसंख्यक करार देने के मामले में संख्या के साथ सक्षमता का मुद्दा भी उतना ही अहम है. उनके इस बयान का हवाला देते हुए अपने एक लेख में मेलबर्न की ऑस्ट्रेलियन कैथलिक यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल एंथ्रॉपॉलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर इरफान अहमद कहते हैं, ‘आजाद का मतलब साफ था कि भावी लोकतांत्रिक राजनीति में सत्ता तक पहुंच और उसमें हिस्सेदारी के मोर्चे पर पिछड़ापन ही किसी समूह के अल्पसंख्यक कहलाए जाने का मुख्य आधार होगा.’

क्या भारत में मुस्लिम समुदाय इन शर्तों को पूरा करता है? पहले तादाद यानी संख्या की बात करते हैं. 2014 में अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय संभालते ही भाजपा नेता नजमा हेपतुल्ला ने बयान दिया था कि देश में अल्पसंख्यक मुसलमान नहीं बल्कि पारसी हैं. तब इसका यह मतलब निकाला गया कि भारत में मुसलमानों की संख्या इतनी कम नहीं है कि उन्हें अल्पसंख्यक कहा जाए. आज भी कई यह तर्क देते हैं. वैसे आंकड़े देखे जाएं तो सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देशों में इंडोनेशिया के बाद दूसरा स्थान भारत का ही है जहां करीब 19 करोड़ मुसलमान रहते हैं. माना जा रहा है कि 2050 तक वह दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाला देश होगा. इसलिए कई मानते हैं कि भारत में मुसलमानों को अल्पसंख्यक नहीं बल्कि दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक समुदाय माना जाना चाहिए.

लेकिन दूसरी तरफ कई मानते हैं कि अल्पसंख्या को तुलनात्मक रूप से समझा जाना चाहिए और इस लिहाज से देखें तो 135 करोड़ की आबादी वाले भारत में बहुसंख्यक हिंदुओं के मुकाबले मुसलमान अल्पसंख्यक ही हैं. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट की मानें तो 2019 में भारत की अनुमानित जनसंख्या 136.6 करोड़ थी. इसमें 80.5 फीसदी हिंदू थे जबकि 13.4 फीसदी मुस्लिम. आबादी में 2.3 फीसदी ईसाई, 1.9 फीसदी सिख, 0.8 फीसदी बौद्ध, 0.4 फीसदी जैन और 0.6 फीसदी अन्य थे.

यह बात कई विश्लेषक मानते हैं कि अल्पसंख्यक होने की शर्त सिर्फ संख्या के मामले में दूसरों से कम होना नहीं है. उनके मुताबिक किसी समुदाय को अल्पसंख्यक करार देते समय उसकी आबादी के साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह कितना समृद्ध और प्रभावशाली है या फिर समाज की विभिन्न व्यवस्थाओं में बहुसंख्यक वर्ग की तुलना में उसका प्रतिनिधित्व कितना है.

चर्चित राजनीतिक विज्ञानी आंद्रे लीबिख मानते हैं कि किसी समुदाय को अल्पसंख्यक कहे जाने के दो प्रमुख आधार हैं – पहला, गैरबराबरी और दूसरा, उसमें बाकियों से कमतर होने की भावना. इस लिहाज से कई तर्क देते हैं कि संख्या में कम होते हुए भी जैन समुदाय आर्थिक समृद्धि और सामाजिक रसूख के मामले में दूसरे समुदायों से कहीं आगे है और इसलिए उसे अल्पसंख्यक नहीं माना जा सकता.

लेकिन क्या यही बात मुस्लिम समुदाय के मामले में कही जा सकती है? कई जानकारों के मुताबिक इस सवाल का जवाब सच्चर समिति की रिपोर्ट में भी खोजा जा सकता है. देश में मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक दशा जानने के लिए 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था. करीब चार सौ पन्नों की उसकी रिपोर्ट 30 नवंबर, 2006 को लोकसभा में पेश की गई. इसमें कहा गया था कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति के तहत आने वाले समुदायों से भी खराब है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मुसलमानों के बीच वंचित या दूसरों के मुकाबले कमतर होने की भावना काफी आम है. सच्चर समिति ने इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए मुस्‍लि‍म बहुल क्षेत्रों में सरकारी स्‍कूल खोलने, 14 वर्ष तक के मुस्लिम बच्‍चों को मुफ्त और उच्‍च गुणवत्‍ता वाली शि‍क्षा उपलब्‍ध कराने, मदरसों के आधुनि‍कीकरण और रोजगार में मुसलमानों का हिस्सा बढ़ाने जैसी कई सिफारिशें की थीं.

हालांकि इस सिलसिले में कोशिशें सच्चर समिति के वजूद में आने के काफी पहले से होने लगी थीं. 1978 में एक प्रस्ताव के जरिये केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अल्पसंख्यक आयोग बनाया था. प्रस्ताव में कहा गया था कि संविधान में दिए गए संरक्षणों और कई कानूनों के बावजूद देश के अल्पसंख्यकों में एक असुरक्षा और भेदभाव की भावना है. अल्पसंख्यक आयोग का मकसद इस भावना को मिटाना था. फिर 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून वजूद में आया जिसके जरिये अल्पसंख्यक आयोग का स्वरूप प्रशासकीय से वैधानिक हो गया.

बहुत से लोग मानते हैं कि यह बदलाव तत्कालीन राजनीतिक हालात का नतीजा था. जैसा कि हिलाल अहमद कहते हैं, ‘(राम) मंदिर की राजनीति ने जब बाबरी मस्जिद के ध्वंस का कारण बनने वाले एक बड़े आंदोलन के लिए ज़मीन तैयार कर दी, तो कांग्रेस की सरकार ‘अल्पसंख्यकों’ खासकर मुसलमानों में पैठ बनाने के लिए एक पैकेज लेकर आई. शायद इनमें सबसे महत्वपूर्ण कदम था राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून (1992) का बनाया जाना. इसमें कुछ धार्मिक समुदायों के दूसरों की अपेक्षा हाशिये पर पड़े होने के कारणों के मूल्यांकन की ज़रूरत पर बल दिया गया था.’

इस कानून के तहत मई 1993 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना हुई. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून में भी अल्पसंख्यक शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई. इसमें सिर्फ इतना कहा गया कि इस कानून के तहत अल्पसंख्यक समुदाय सिर्फ उसको माना जाएगा जिसे केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर ऐसा दर्जा दिया हो. 23 अक्टूबर 1993 को एक अधिसूचना जारी कर तत्कालीन पीवी नरसिम्हाराव सरकार ने मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया. 2014 में जैन समुदाय को भी इसमें जोड़ दिया गया. यानी देश में अब छह अल्पसंख्यक समुदाय हैं.

कई लोग मानते हैं कि संविधान और कानूनों में मौजूद अस्पष्टता के चलते अल्पसंख्यकों से जुड़े प्रावधानों का काफी दुरुपयोग हो रहा है. जैसा कि अपने एक लेख में इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले चर्चित अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘मिसाल के तौर पर 2011 की जनगणना के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में 68 फीसद जनसंख्या मुसलमानों की है. अत: जनसंख्या के आधार पर इस राज्य में मुसलमान किसी भी दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक नहीं कहे जा सकते हैं. लेकिन वहां, अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सारी सहूलियतें इन्हें मिलती हैं, जबकि वहां हिंदू समुदाय जो वास्तविक रूप से अल्पसंख्यक है, उन सुविधाओं से महरूम है.

लेकिन ऐसा सिर्फ जम्मू-कश्मीर में नहीं है. कई मानते हैं कि अल्पसंख्यक शब्द की ठीक-ठीक परिभाषा न होने के चलते भारत के कई हिस्सों में उस समुदाय के साथ अन्याय हो रहा है जो वहां सही मायनों में अल्पसंख्यक है. ऐसा कहने वाले तर्क देते हैं कि मुस्लिम बहुल लक्षद्वीप में हिंदू सिर्फ 2.7 फीसदी हैं और ईसाई बहुल मिजोरम में भी उनकी आबादी का आंकड़ा करीब इतना ही है, लेकिन जो अधिकार उन्हें मिलने चाहिए वे स्थानीय बहुसंख्यकों को मिल रहे हैं. इस बात को आगे बढ़ाते हुए नगालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब का भी उदाहरण दिया जाता है जहां हिंदू अल्संख्यक हैं.

अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, ‘जम्मू-कश्मीर में वर्ष 2016-17 में अल्पसंख्यकों के लिए निर्धारित प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप का फायदा जिन छात्रों को मिला है उनमें 1 लाख 5 हजार से अधिक छात्र मुसलमान समुदाय से आते हैं जबकि सिख, बौद्ध, पारसी और जैन धर्म के 5 हजार छात्रों को ही इसका फायदा मिल सका है. इसमें भी हिंदू समुदाय के किसी भी छात्र को इसका फायदा नहीं मिला है.’ उनके मुताबिक ऐसे में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के मायने और उसकी परिभाषा को दुरुस्त किया जाना जरूरी है. कुछ विश्लेषक इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि जब अनुसूचित जातियों और जनजातियों के मामले में एक राज्य से दूसरे राज्य जाते हुए स्थिति बदल जाती है तो ऐसा ही अल्पसंख्यकों के मामले में भी होना चाहिए.

अश्विनी उपाध्याय ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की थी. इस याचिका में मुख्य दलील यही थी कि या तो जिन राज्यों में हिंदू समुदाय के लोगों की जनसंख्या कम है वहां उन्हें अल्पसंख्यकों का दर्जा और सुविधाएं मिलें या फिर अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक मंत्रालय ख़त्म किया जाए. लेकिन 2019 में अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी. उसका कहना था कि अल्पसंख्यक कौन है, यह राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाना चाहिए, न कि अलग अलग राज्य के आधार पर. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालत ने किसी को अल्पसंख्यक घोषित नहीं किया और यह सरकार का काम है. इसके बाद अश्विनी उपाध्याय ने एक बार फिर शीर्ष अदालत में याचिका दायर करके उससे अनुरोध किया है कि वह सरकार को अल्पसंख्यक शब्द की परिभाषा तय करने का निर्देश दे. उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून की धारा 2(सी) की वैधानिकता को भी चुनौती दी है जो केंद्र सरकार को एक अधिसूचना के जरिये किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार देती है. फिलहाल इस मामले की सुनवाई जारी है.

वैसे अतीत में कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट यह भी कह चुका है कि कौन अल्पसंख्यक है, इसका निर्धारण राज्य स्तर पर होना चाहिए, न कि राष्ट्रीय स्तर पर. उदाहरण के लिए 1964 के एल्डो मारिया और अन्य बनाम ईसी केशवन और अन्य मामले में अनुच्छेद 30 (अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और उनके प्रशासन के अधिकार से संबंधित) के संदर्भ में शीर्ष अदालत ने कहा था, ‘संविधान में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है; और किसी विशेष परिभाषा की अनुपस्थिति में हमें यह मानना चाहिए कि कोई भी धार्मिक या भाषाई समुदाय अगर किसी राज्य की कुल आबादी में 50 फीसदी से कम हिस्सेदारी रखता है तो उसे इस अनुच्छेद के तहत मिलने वाला अधिकार हासिल है.’ यही बात सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के टीएमए पई फाउंडेशन और अन्य बनाम कर्नाटक सरकार और अन्य मामले में भी दोहराई.

कई मानते हैं कि ऐसा सिर्फ अनुच्छेद 30 ही नहीं बल्कि हर मामले में होना चाहिए. लेकिन हर बार बात शुरू होती है और फिर बीच में अटक जाती है. उदाहरण के लिए फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक आयोग से कहा था कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करे. इसके लिए उसे तीन महीने का वक्त दिया गया था. लेकिन कुछ नहीं हुआ. अब फिर से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

वैसे अगर कोई अल्पसंख्यक समुदाय किसी राज्य में बहुसंख्यक है तो वहां पर दूसरे अल्पसंख्यकों के लिए तो केंद्र सरकार ने एक विशेष प्रावधान किया है. अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री के नए 15-सूत्रीय कार्यक्रम को लेकर केंद्र के दिशा-निर्देशों में साफ लिखा हुआ है कि अगर राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक अधिसूचित किया गया कोई समुदाय किसी राज्य में बहुसंख्यक है तो अलग-अलग योजनाओं के तहत होने वाला आवंटन दूसरे अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के लिए ही होना चाहिए. लेकिन इन नियमों में भी राज्य में अल्पसंख्यक उस समुदाय के लिए कोई प्रावधान नहीं है जो राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक है. और फिलहाल इन नये दिशा-निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं, यह सुनिश्चित करने के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है.

इस सबके इतर कई लोग मानते हैं कि अल्पसंख्यकों को अधिसूचित किए जाने की कवायदें संविधान के खिलाफ हैं. उनके मुताबिक एक ओर तो संविधान का अनुच्छेद 15 है जो कहता है कि राज्य अपने किसी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग, नस्ल और जन्म स्थान या इनमें से किसी भी आधार पर कोई भेद नहीं करेगा, और दूसरी तरफ धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक पहचान और विशेषाधिकार तय हो रहे हैं. जैसा कि अपने एक लेख में उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित कहते हैं, ‘भारतीय राष्ट्र राज्य ने उद्देशिका से लेकर सभी संवैधानिक प्रावधानों में प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार दिए हैं. तब अल्पसंख्यक होने का औचित्य क्या है?’ संविधान निर्माताओं को मजहबी अल्पसंख्यकवाद के विरुद्ध बताते हुए वे आगे लिखते हैं, ‘पंथिक और मजहबी विशेषाधिकार दोधारी तलवार होते हैं. वे एक धार से सुविधाभोगी लोगों में अलगाववाद का विचार देते हैं और दूसरी धार से सुविधा न पाने वाली बहुसंख्या को भी उत्तेजित करते हैं.’ अश्विनी उपाध्याय इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘संविधान में सभी नागरिकों को बराबर अधिकार मिला हुआ है, इसलिए अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आधार पर समाज का विभाजन बंद किया जाए.

अमेरिका के 32वें राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने कभी कहा था कि ऐसा कोई भी लोकतंत्र लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों को स्वीकार न करता हो. कई मानते हैं कि संविधान में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित न करने की वजह उस समय के हालात थे, लेकिन आज के हालात को देखते हुए ऐसा होना चाहिए. अश्विनी उपाध्याय मानते हैं कि अगर अल्पसंख्यकों के लिए अलग से अधिकार रखने ही हैं तो अल्पसंख्यक की परिभाषा और राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशा-निर्देश तय हों. उनके मुताबिक यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल उसी समुदाय को संविधान के अनुच्छेद 29-30 का संरक्षण मिले जो वास्तव में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से प्रभावहीन हो.

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