नरेंद्र मोदी

विज्ञान-तकनीक | स्वास्थ्य

10 सवाल जिनके जवाब कोविड वैक्सीनेशन से जुड़ी आपकी ज्यादातर दुविधाओं को दूर कर सकते हैं

क्या आपको पता है कि कोविड हो जाने के बाद टीका लगवाना है या नहीं, या फिर उसकी पहली खुराक के बाद संक्रमित हो जाने पर क्या करना सही होगा?

अंजलि मिश्रा | 13 अप्रैल 2021 | फोटो: ट्विटर/नरेंद्र मोदी

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल का पहला सप्ताह बीतने के साथ देश में 8.70 करोड़ लोगों को कोविड-19 वैक्सीन लगाया जा चुका था. रोज़ाना लगाए जाने वाले टीकों की बात करें तो मंत्रालय के ही आंकड़े बताते हैं कि सात अप्रैल तक इनका औसत 30,93,861 था. इतने बड़े पैमाने पर चल रहे इस टीकाकरण अभियान में वैक्सीन लगवा चुके या लगवाना चाह रहे लोग, इसकी ज़रूरत और महत्व को समझने के बावजूद कई तरह की आशंकाओं से भी घिरे हुए हैं. सत्याग्रह यहां पर कुछ ऐसे सवालों के जवाब खोजने की कोशिश कर रहा है जो वैक्सीनेशन से जुड़ी आपकी तमाम दुविधाओं और आशंकाओं को खत्म कर सकते हैं.

क्या वैक्सीन लगने के बाद कोरोना संक्रमण नहीं होगा?

यह जानना थोड़ा चौंकाने वाला हो सकता है कि वैक्सीन कोरोना संक्रमण से नहीं बचाती है यानी कि वैक्सीन लगने के बाद भी किसी को कोरोना वायरस का संक्रमण हो सकता है. इतना ही नहीं, इसके बाद वह और लोगों को संक्रमित भी कर सकता है. वैक्सीन से मिली रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी कोविड-19 की गंभीरता को कम करती है. ऐसे ज्यादातर मामलों में संक्रमित को अस्पताल ले जाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती है और अगर ले जाना भी पड़े तो उसे न्यूमोनिया होने या शरीर के किसी और अंग को कोई गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा बहुत कम हो जाता है. इसके अलावा, वैक्सीनेशन के चलते आसपास के लोगों को संक्रमित करने की संभावना भी कुछ हद तक कम हो जाती है. इसलिए अपने साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों, गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों और बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से भी वैक्सीनेशन ज़रूरी है.

वैक्सीन के दोनों डोज़ के बीच कितने दिनों का अंतराल रखा जाना चाहिए?

भारत में कोविड-19 से बचने के लिए दो टीके – कोवीशील्ड और कोवैक्सिन – उपलब्ध हैं. शुरूआत में दोनों ही वैक्सीनों के पहले और दूसरे डोज़ के बीच 28 से 42 दिनों का अंतराल रखा गया था. स्वास्थ्य विज्ञानियों का कहना है कि वैक्सीन का पहला डोज़ लगने के बाद, शरीर में एंटीबॉडीज बनने में दो से तीन हफ्ते का समय लगता है. इस दौरान शरीर में धीमी रफ्तार से रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होना शुरू होती है जिसके लिए कम से कम 28 दिनों का समय दिया जाना ज़रूरी है. इस समयांतराल के बाद दिया गया दूसरा डोज़ या बूस्टर डोज़ एंटीबॉडीज़ बनाने की इस प्रक्रिया को तेज़ कर देता है.

कोवैक्सिन के लिए दोनों डोज़ के बीच रखा गया अंतर अभी भी 4-6 सप्ताह ही है. लेकिन कोवीशील्ड की बात करें तो हाल ही में इसके लिए निर्धारित समयांतराल को बढ़ाकर अब चार से आठ सप्ताह कर दिया गया है. यानी अब 28 दिन बाद तो वैक्सीन लिया ही जा सकता है लेकिन 56 दिन पूरे होने का इंतज़ार भी किया जा सकता है. दरअसल बीती फरवरी में हुए एक अध्ययन में यह पाया गया था कि जब वैक्सीन का दूसरा डोज छह हफ्ते के भीतर दिया गया तो यह 54.9 फीसदी असरकारी रहा. अवधि को छह से आठ हफ्ते करने पर यह आंकड़ा 59.9, नौ से 11 हफ्ते के बीच करने पर 63.7 और 12 हफ्ते या उससे ज्यादा करने पर बढ़कर 82.4 फीसदी तक पहुंच गया.

कोवीशील्ड की निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के सीईओ अदर पूनावाला भी अपने कई साक्षात्कारों में कह चुके हैं कि ‘अगर दोनों डोज़ के समयांतराल को तीन महीने रखा जाता है तो वैक्सीन की एफिकेसी 90 फीसदी रहती है.’ कई देशों में एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन यानी कोवीशील्ड के लिए तय समयांतराल 12 हफ्ते ही है लेकिन भारतीय नियामकों ने इसे अभी आठ हफ्ते तक ही सीमित रखा है. ऐसा माना जा रहा है कि भविष्य में समुचित डेटा मुहैया हो जाने पर इसे और बढ़ाया जा सकता है. फिलहाल सबसे अच्छा विकल्प इसे सात से आठ सप्ताह के बीच लगवाना होना चाहिए.

वैक्सीन कितने समय के लिए प्रभावी होगी?

कोरोना वायरस से निपटने में इस्तेमाल किए जा रहे तमाम टीकों को इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए अनुमति दी गई है. ये सभी टीके बीते कुछ महीनों में ही विकसित किए गए हैं यानी इनमें से किसी भी वैक्सीन को विकसित करने के लिए सालों-साल चलने वाले ट्रायल नहीं किए जा सके हैं. इसलिए वैज्ञानिक वैक्सीन्स के लंबे समय तक प्रभावी होने के बारे में अभी किसी भी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं.

कुछ उदाहरणों पर गौर करें तो अमेरिका में इस्तेमाल की जा रही मोडेर्ना और फाइज़र वैक्सीन के छह महीने के लिए प्रभावी होने की बात कही जा रही है. वहीं, भारत में इस्तेमाल की जा रही है कोवीशील्ड के मामले में यह आंकड़ा आठ महीने बताया जा रहा है. कोवीशील्ड से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वैक्सीन का पहला इस्तेमाल हुए अभी तक महज आठ महीने बीते हैं, इसलिए मौजूदा डेटा कम से कम आठ महीने सुरक्षा देने की बात कहते हैं लेकिन आने वाले समय में यह अवधि बढ़ भी सकती है.

मोडेर्ना, फाइज़र, कोवीशील्ड समेत तमाम टीकों को विकसित करने वाले वैज्ञानिक इशारा देते हैं कि अगर वैक्सीन से लंबे समय के लिए, इम्युनिटी विकसित नहीं होती है तो कुछ समय बाद एक और बूस्टर डोज़ दिया जा सकता है. कुछ संभावनाएं कहती हैं कि हर साल डोज़ दिए जाने की ज़रूरत भी पड़ सकती है. फिलहाल, ज्यादातर वैक्सीनों के एक से डेढ़ साल तक प्रभावी होने की उम्मीद की जा रही है. इतने समय में वैज्ञानिक तबका वैक्सीन के कई और विकल्प और इलाज के आधुनिक तरीके विकसित होने की उम्मीद भी जताता दिखता है.

क्या वैक्सीन बच्चों को दी जा सकती है?

वैक्सीन आम तौर पर पहले केवल वयस्कों पर आजमाई जाती हैं. एक बार यह स्थापित हो जाने पर कि कोई वैक्सीन वयस्कों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित और प्रभावी है, बच्चों पर इसका परीक्षण करना शुरू किया जाता है. भारत में लगाई जा रही वैक्सीनों की बात करें तो कुछ समय पहले ही बच्चों पर कोवीशील्ड का परीक्षण शुरू हुआ है जिसके नतीजे अगले तीन-चार महीनों में आएंगे. इसके बाद ही कहा जा सकेगा कि यह बच्चों के लिए सुरक्षित है या नहीं.

वहीं, कोवैक्सिन के मामले में ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीजीसीआई) ने 12 साल से अधिक उम्र वालों के लिए इसके इस्तेमाल की अनुमति दी है. चूंकि फिलहाल फ्रंट लाइन वर्कर्स, वरिष्ठ नागरिकों और स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त लोगों को वैक्सीनेशन में वरीयता दी जा रही हैं इसलिए युवा और बच्चों को यह वैक्सीन नहीं दी जा सकती. वैसे कोरोना वायरस के दुष्प्रभाव बच्चों पर अपोक्षाकृत कम देखने को मिल रहे हैं इसलिए दुनिया भर में 16 साल से अधिक आयु वालों को ही वैक्सीन दी जा रही है. वहीं, बच्चों के लिए सुरक्षा उपाय के तौर पर मास्क लगाना, हाथ धोना, सोशल डिस्टेंसिंग जैसी सावधानियों को ही बरतने की सलाह दी जा रही है.

क्या सर्दी-बुखार होने पर वैक्सीन लगवानी चाहिए?

सर्दी-बुखार होने पर वैक्सीन ना लगवाने की सलाह दी जाती है क्योंकि ऐसे समय में व्यक्ति की इम्युनिटी कमजोर होती है और शरीर वायरस से लड़ रहा होता है. चूंकि वैक्सीन भी शरीर में इम्यून रिस्पॉन्स को वैसे ही ट्रिगर करती है जैसे कि कोई बीमारी करती है, इसलिए सर्दी-बुखार के दौरान वैक्सीन लेने पर ये लक्षण गंभीर हो सकते हैं. इसके अलावा, सर्दी-बुखार कोरोना संक्रमण के लक्षणों में से भी एक है, इसलिए भी इस दौरान वैक्सीन न लेने की सलाह दी जाती है. यहां पर यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि अगर कोई कोरोना संक्रमित है तो उसे वैक्सीन नहीं लेनी चाहिए. इसके साथ ही, अगर पहला डोज़ लगने के बाद किसी को कोरोना संक्रमण हो जाता है तो भी उसे अगला डोज़ तब तक नहीं लेना चाहिए, जब तक संक्रमण के लक्षण पूरी तरह से चले न जाएं.

वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि सर्दी-बुखार के अलावा अगर किसी को किसी तरह की एलर्जी हो, किसी तरह का ब्लीडिंग डिसऑर्डर या रोग प्रतिरोधक क्षमता से संबंधित कोई समस्या हो तो उसे भी वैक्सीन नहीं लगवानी चाहिए. इसके साथ ही, गर्भवती और दूध पिलाने वाली महिलाओं या प्रेग्नेंसी प्लान कर रही महिलाओं को भी वैक्सीन न लगवाने की सलाह दी जा रही है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैक्सीन महिलाओं (या पुरुषों) की प्रजनन क्षमता पर किसी तरह का बुरा असर डालती है. इसके अलावा, पीरियड्स के दौरान वैक्सीन लगवाने में भी स्वास्थ्य विज्ञानी कोई समस्या नहीं देखते हैं.

अगर कोई पहले ही कोरोना संक्रमित हो चुका हो तो क्या उसे वैक्सीन लेने की ज़रूरत है?

वैज्ञानिकों को कहना है कि संक्रमण से शरीर में विकसित होने वाली इम्युनिटी, अलग-अलग लोगों में अलग-अलग तरह से काम करती है. चूंकि संक्रमण की गंभीरता और उस समय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के मुताबिक शरीर संक्रमण का सामना करता है और ठीक होने पर, शरीर में इसी के मुताबिक (कम या ज्यादा मात्रा में) मेमोरी सेल्स सक्रिय होती हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि यह इम्युनिटी कितनी प्रभावी और कितने समय तक रहने वाली है. इसीलिए संक्रमण का शिकार हो चुके लोगों को भी वैक्सीन लेने की सलाह दी जाती है, फिर चाहे संक्रमण एक साल पहले हुआ हो या कुछ ही हफ्ते पहले. और इस तरह के लोगों को भी वैक्सीन के दोनों डोज़ लेना ज़रूरी है. और अगर किसी को पहला डोज़ लेने के बाद कोरोना संक्रमण हो जाए तो उसे संक्रमण के लक्षण खत्म होते ही दूसरा डोज़ ले लेना चाहिए.

पूरे देश का टीकाकरण होने में कितना समय लगेगा?

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण बीते हफ्ते मीडिया से बात करते हुए, यह कहते नज़र आए थे कि ‘वैक्सीन उनके लिए है जिन्हें इसकी ज़रूरत है न कि उनके लिए जो वैक्सीन लगवाना चाहते हैं. कई लोग पूछ रहे हैं कि हम सभी के लिए टीका क्यों नहीं उपलब्ध करवा रहे हैं. टीकाकरण अभियान के दो मुख्य उद्देश्य कोविड से होने वाली मौतों को कम करना और हेल्थकेयर सिस्टम को अतिरिक्त दबाव से बचाना है.’ फिलहाल राजनीतिक नेतृत्व से लेकर वैज्ञानिकों तक का कहना यही है कि इन परिस्थितियों में यह कहना मुश्किल है कि पूरी जनसंख्या का टीकाकरण होने में कितना समय लग सकता है.

तमाम जगहों पर वैक्सीन की कमी और उसके उत्पादन में हो रही देरी भी इस सवाल का कोई निश्चित जवाब ना मिल पाने की एक वजह है. साथ ही अभी यह भी नहीं पता कि वैक्सीन कितने दिन प्रभावी रहेगी. यानी कि ऐसा भी हो सकता है कि वैक्सीन लगवा चुके लोगों की इम्युनिटी सबको वैक्सीन लगने से पहले ही खत्म हो जाए. लेकिन इस बात की भी प्रबल संभावना है कि कुछ समय में कुछ और वैक्सीन भारत में उपलब्ध हो जाएं. और जो पहले से ही उपलब्ध हैं उनका उत्पादन आज की तुलना में काफी बढ़ जाए. लेकिन इनका असर महसूस होने में इस साल के अंत तक का समय लग सकता है.

कोवीशील्ड के चलते ब्रेन में ब्लड क्लॉटिंग की शिकायतों को कितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिए?

यूरोप के कुछ देशों में, वैक्सीन लेने के बाद लोगों के मस्तिष्क में खून के थक्के (ब्लड क्लॉट) जमने की शिकायतें सामने आई थीं. इसके बाद कुछ समय के लिए कोवीशील्ड के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई थी. इन शिकायतों की गंभीरता परखने के लिए आंकड़ों पर गौर करें तो पचास लाख लोगों को वैक्सीन लगाए जाने के बाद 30 लोगों के मस्तिष्क में ब्लड क्लॉटिंग देखने को मिली थी. इनमें सात लोगों की मौत भी हो चुकी है. इन मामलों की संख्या बहुत कम होने के चलते ज्यादातर स्वास्थ्यविद इसे वैक्सीन का दुष्प्रभाव मानने से इनकार करते हैं. वहीं, कोवीशील्ड के निर्माताओं का कहना है कि यूरोपियन मेडिसिन्स एजेंसी (ईएमए) इस मामले की जांच कर रही है. निर्माता तर्क देते हैं कि इससे पहले वैक्सीन के चलते लोगों में प्रतिकूल न्यूरोलॉजिकल बदलावों की बात भी कही गई थी लेकिन बाद में हुई जांच में वैक्सीन को इसका जिम्मेदार नहीं पाया गया. उन्हें उम्मीद है कि ब्लड क्लॉटिंग के मामले में यही नतीजे दोहराए जा सकते हैं.

क्या भारत में लगाए जा रहे टीके वायरस के अलग-अलग वैरिएंट्स के लिए प्रभावी होंगे?

ज्यादातर वैक्सीन इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे वायरस के एक से अधिक वैरिएंट के लिए भी प्रभावी हों. कोवीशील्ड के बारे में दावा किया जा रहा है कि यह वैक्सीन वुहान वायरस (कोरोना वायरस के शुरूआती वैरिएंट) के लिए जहां 85 फीसदी तक प्रभावी है. वहीं, यूके, साउथ अफ्रीका और अन्य वैरिएंट के लिए 40 से 60 फीसदी तक प्रभावी पाई गई है. भारत में यूके वैरिएंट से जुड़े संक्रमण के मामलों में पाया गया है कि वैक्सीन लगने के बाद संक्रमण होने पर किसी को भी अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत नहीं आई है. कोवैक्सिन की बात करें तो जनवरी में एक शोध के हवाले से आईसीएमआर का कहना था कि यह यूके, ब्राजील और साउथ अफ्रीका वैरिएंट से भी बचा सकती है.

कोवैक्सिन या कोवीशील्‍ड?

कोवैक्सिन की दो खुराकों के बीच का अंतराल कम होने की वजह से उसका सुरक्षा कवच कोवीशील्ड से थोड़ा पहले काम करना शुरू कर सकता है. इसके अलावा कोवैक्सिन का एफिकेसी रेट 81% बताया जा रहा है. वहीं, एस्ट्राज़ेनेका या कोवीशील्ड के मामले में दोनों डोज़ में रखे गए समयांतराल के हिसाब से यह 60 से 90 फीसदी हो सकता है. कोवीशील्ड और कोवैक्सिन, दोनों को ही लगाए जाने के बाद टीके की जगह पर दर्द, सूजन, खुजली, गर्माहट या लाली देखने को मिल सकती है. इसके अलावा वैक्सीन की वजह से बुखार, सिरदर्द, जोड़ों में दर्द, कमजोरी आदि लक्षण भी देखने को मिल सकते हैं. इसके लिए खूब पानी पीने की जरूरत है और पैरासिटामॉल भी ली जा सकती हैं. अगर लक्षण ज्यादा गंभीर हों तो तुरंत अस्पताल जाने की सलाह दी जाती है. जानकारों के मुताबिक कोवैक्सिन की तुलना में कोवीशील्ड के साइड इफेक्ट्स कम देखने को मिल रहे हैं.

दरअसल कोवीशील्ड आधुनिक वायरल वेक्टर टेक्नॉलजी से बनाई गई वैक्सीन है. इसमें चिंपाज़ियों में सर्दी-जुकाम के लिए जिम्मेदार एडनोवायरस का इस्तेमाल वाहक की तरह किया गया है. इसकी मदद से शरीर में कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन (या कहें वायरस के जेनेटिक कोड्स) को शरीर में पहुंचाने की व्यवस्था की गई है. इस तरह की वैक्सीन से बगैर वायरस का प्रवेश करवाए, अपने आप शरीर में उसकी मेमोरी सेल्स तैयार की जाती हैं. ऐसा करने से वैक्सीन के साइड इफेक्ट्स आशंका कम हो जाती है. दूसरी तरफ, कोवैक्सीन के निर्माण में असक्रिय कोरोना वायरस का इस्तेमाल किया गया है. यह वैक्सीन बनाने का दशकों पुराना और आजमाया हुआ तरीका है. कुल मिलाकर यह कहना मुश्किल है कि दोनों में से कौन सी वैक्सीन बैहतर है. और अगर इस मामले में किसी नतीजे पर पहुंच भी गए तो फिलहाल अस्पताल में वैक्सीन चुनने की आज़ादी किसी को नहीं है. इस समय कोवैक्सिन के मुकाबले कोवीशील्ड का उत्पादन काफी बड़े स्तर पर हो रहा है इसलिए ज्यादातर लोगों को वही लगाई जा रही है.

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