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क्या ‘लव जिहाद’ कानून बनाकर सरकारें खुद को खाप पंचायतों में तब्दील कर रही हैं?

भाजपा शासित राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने की होड़ दिख रही है जिन्हें लव जिहाद कानून कहा जा रहा है

विकास बहुगुणा | 23 जनवरी 2021 | फोटो: पिक्साबे

ऐसा लगता है कि भाजपा शासित राज्यों में ‘लव जिहाद’ के खिलाफ कानून बनाने की होड़ शुरू हो गई है. बीते दिनों उत्तर प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश ने भी इस कानून पर मुहर लगा दी. वहां के भाजपा नेताओं का दावा है कि यह उत्तर प्रदेश वाले कानून से भी कठोर है. खबरें हैं कि कुछ अन्य राज्यों की सरकारें भी इस तरह के कानून बनाने की तैयारी में हैं. उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में भी पहले ही इस तरह के कानून बन चुके हैं.

इन कानूनों को धर्मांतरण विरोधी तो कहा ही जा रहा है, इन्हें लेकर भाजपा नेता जिस तरह से बयान दे रहे हैं उसे देखते हुए इनके लिए ‘लव जिहाद’ कानून शब्द प्रचलन में आ गया है. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में यह कानून लाने से पहले इसका ऐलान करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा कि इसे लव जिहाद को सख्ती से रोकने के लिए लाया जा रहा है. उनका कहना था, ‘छद्म वेश में, चोरी-छिपे, नाम छिपा के, स्वरूप छिपा के जो लोग बहन-बेटियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ करते हैं उनको पहले से मेरी चेतावनी, अगर वे सुधरे नहीं तो राम नाम सत्य है की यात्रा अब निकलने वाली है.’ भाजपा के कई दूसरे नेताओं की तरफ से भी इस तरह के बयान आए हैं.

उत्तर प्रदेश में यह कानून लागू होने के बाद इसके तहत जो मामले दर्ज हुए हैं उन्हें देखते हुए यह लगता है कि इसका मकसद अंतरधार्मिक रिश्तों पर लगाम लगाना है, खास कर उन रिश्तों पर जिनमें पुरुष मुस्लिम हो और महिला हिंदू. आंकड़े बताते हैं कि 24 नवंबर को इस कानून के अमल में आने के एक महीने बाद पुलिस इसके तहत 14 मामले दर्ज कर चुकी थी. इनमें 51 गिरफ्तारियां हुईं. 14 मामलों में से 13 ऐसे थे जिनमें हिंदू महिलाओं पर इस्लाम अपनाने का दबाव डाले जाने का आरोप था.

दक्षिणपंथी संगठन खास कर ऐसी शादियों और प्रेम संबंधों को ही लव जिहाद कहते हैं जिनमें पुरुष मुसलमान हो और महिला हिंदू. ये संगठन आरोप लगाते हैं कि इनके पीछे का मकसद हिंदू लड़कियों को मुसलमान बनाना होता है. करीब 10 साल पहले कर्नाटक और केरल में इस शब्द का इस्तेमाल होना शुरू हुआ था जो अब आम हो चला है.

उत्तर प्रदेश सरकार ने जो कानून बनाया है उसका नाम है – उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020. इसकी शुरुआत में ही इसकी जरूरत बताते हुए कहा गया है, ‘चूंकि राज्य विधानमंडल सत्र में नहीं है और राज्यपाल का यह समाधान हो गया है कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं, जिसके कारण उन्हें तुरंत कार्यवाही करना आवश्यक हो गया है.’ ऐसी क्या परिस्थितियां थीं, इस बारे में अध्यादेश में कुछ नहीं लिखा है. लेकिन जिस तरह से सत्ता पक्ष के नेता इसके बारे में बयान दे रहे हैं उन्हें देखते हुए माना जा सकता है कि ऐसा बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के मामले देखते हुए किया गया होगा, खास कर वह धर्मांतरण जो शादियों की आड़ में होता है.

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? यह जानने की कोशिश में कुछ साल पहले आये एक शोध पत्र की जानकारी मिलती है. यह शोध पत्र केंद्र सरकार के तहत आने वाले अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान का है. इसमें कहा गया है कि भारत में 15-49 साल की विवाहित महिलाओं में से 2.21 फीसदी ऐसी हैं जिन्होंने अपने धर्म के बाहर शादी की है. यानी कहा जा सकता है कि शादी के लिए बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हो रहा हो, ऐसे संकेत नहीं हैं. इस तरह के कई कारण हैं जिनके चलते इस कानून पर सवाल उठ रहे हैं. हाल में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन लोकुर का इसकी आलोचना करते हुए कहना था, ‘संविधान कहता है कि कोई अध्यादेश तभी पारित किया जाए जब किसी मुद्दे पर फौरन कार्रवाई की जरूरत हो. जब विधानसभा सत्र नहीं चल रहा था तो ऐसा अध्यादेश पारित करने की क्या जरूरत थी? बिल्कुल नहीं थी.’

कई जानकार मानते हैं कि इस तरह के कानूनों के जरिए सरकारें ठीक वैसा ही व्यवहार कर रही हैं जैसा खाप पंचायतें करती हैं. दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एपी शाह ने उत्तर प्रदेश सरकार के इस कानून को वक्त में पीछे की ओर लौटने जैसा कदम बताते हुए कहा है, ‘देखा जाए तो अंतरधार्मिक शादियां अब भी दुर्लभ हैं. भारत में 90 फीसदी से ज्यादा शादियां परिवार की मंजूरी से ही होती हैं. बहुत ही कम शादियां एक से दूसरी जाति में होती हैं. एक से दूसरी जाति में शादियां पांच फीसदी हैं. अंतरधार्मिक शादियां तो बहुत ही कम होंगी, दो-तीन फीसदी. भारत में कई दशक से हम राज्य, जाति और धर्म की दीवारों को तोड़ने वाली शादियों की वकालत करते रहे हैं ताकि सांप्रदायिक सौहार्द कायम हो. अंबेडकर इसके बड़े समर्थक थे.’ वे आगे कहते हैं, ‘यकीन नहीं होता कि कानून के राज और संविधान से चलने वाले किसी देश में सरकार ने ऐसा कानून बनाया है.’

विधि आयोग के अध्यक्ष रह चुके जस्टिस एपी शाह और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन लोकुर सहित कई मानते हैं कि इन कानूनों में ऐसे कई प्रावधान हैं जो संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन हैं. यह अनुच्छेद हर नागरिक को किसी भी धर्म को मानने की आजादी देता है. इस कानून को अनुच्छेद 21 यानी निजता के अधिकार का उल्लंघन भी बताया जा रहा है. कइयों के मुताबिक यह स्पेशल मैरिज एक्ट की भावना के खिलाफ भी जाता है जिसके तहत दो अलग-अलग धर्मों के लोग शादी कर सकते हैं. इन सब बातों को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के खिलाफ याचिकाएं भी दायर की गई हैं.

इन याचिकाओं के मुताबिक इस कानून का एक और चिंताजनक पक्ष इसका न्याय के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ जाना है जिसके मुताबिक दोषी साबित होने तक हर व्यक्ति निर्दोष है. लेकिन उत्तर प्रदेश में बने कानून के तहत जिस पर मामला दर्ज होगा उसे निर्दोष साबित होने तक दोषी माना जाएगा. जैसा कि जस्टिस एपी शाह कहते हैं, ‘धर्मांतरण के किसी भी आपराधिक मामले में सबूत जुटाने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है. लेकिन इस अध्यादेश में हर तरह के धर्मांतरण को पहले ही अवैध मान लिया गया है.’ यानी खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी आरोपित पर होगी. यही नहीं, यह संज्ञेय अपराध है. यानी इसमें पुलिस बिना वारंट के भी गिरफ्तारी कर सकती है. साथ ही यह गैरजमानती अपराध भी है. इसका मतलब है कि ऐसे मामलों में पुलिस से नहीं बल्कि सिर्फ अदालत से जमानत मिलेगी.

उत्तर प्रदेश सरकार के कानून में प्रावधान है कि धर्मांतरण से 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना देनी होगी. मजिस्ट्रेट इसकी जांच करेगा और अगर यह पता चलता है कि धर्मांतरण के लिए प्रलोभन, प्रपीड़न, बल या कपट का सहारा लिया जा रहा है तो दोषी को एक से पांच साल तक की जेल हो सकती है. नाबालिग या अनुसूचित जाति/जनजाति से ताल्लुक रखने वाले किसी शख्स का इस तरह धर्मांतरण करने पर यह अवधि दो से 10 साल तक की रखी गई है. प्रलोभन को परिभाषित करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के कानून में लिखा गया है – नगद या वस्तु के रूप में कोई उपहार, पारितोषण, सुलभ धन या भौतिक लाभ. जानकारों के मुताबिक यह इतना विस्तृत दायरा है कि कलाई घड़ी यानी रिस्ट वॉच जैसी चीजों को भी धर्मांतरण के उद्देश्य से दिया गया उपहार बताकर किसी पर आरोप लगाया जा सकता है और उसे गिरफ्तार करवाया जा सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि कानून पहले वाले धर्म में वापसी को अवैध नहीं ठहराता, फिर भले ही वह जबरन या भ्रष्ट तरीके से क्यों न किया गया हो. इसमें लिखा गया है, ‘यदि कोई व्यक्ति अपने ठीक पूर्व धर्म में पुन: संपरिवर्तन करता है/करती है, तो उसे इस अध्यादेश के अधीन धर्म संपरिवर्तन नहीं समझा जाएगा.’ जस्टिस एपी शाह कहते हैं, ‘अगर किसी शख्स ने अपनी मर्जी से धर्म बदला हो तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता है. लेकिन अगर उसे अपने पहले वाले धर्म में लौटने के लिए मजबूर किया गया हो तो ये अपराध नहीं है.’

कई मानते हैं कि इस कानून के पीछे पितृसत्तामक सोच है. जैसा कि जस्टिस एपी शाह कहते हैं, ‘महिलाओं की आजादी पितृसत्ता और पुरुष को डराती है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘इस कानून में खास तौर पर महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों की बात की गई है. इसका मतलब साफ है कि कोई महिला अपने हितों के बारे में ठीक से नहीं सोच सकती, भले ही वह कितनी भी शिक्षित हो या उसने कितनी भी उपलब्धियां हासिल की हों या फिर उसे कितना भी अनुभव हो.’

इतिहासकार और दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने वालीं चारु गुप्ता भी यह मानती हैं. अपने एक लेख में वे कहती हैं कि ऐसे कदम हिन्दू स्त्री की सुरक्षा करने के नाम पर असल में उसकी यौनिकता, उसकी इच्छा, और उसकी स्वायत्त पहचान पर नियंत्रण लगाना चाहते हैं. चारु गुप्ता लिखती हैं, ‘साथ ही वे अक्सर हिन्दू स्त्री को ऐसे दर्शाते हैं जैसे वह आसानी से फुसला ली जा सकती है. उसका अपना वजूद, अपनी कोई इच्छा हो सकती है, या वो खुद अंतरधार्मिक प्रेम और विवाह का कदम उठा सकती है –- इस सोच को दरकिनार कर दिया जाता है. मुझे इसके पीछे एक भय भी नजर आता है, क्योंकि औरतें अब खुद अपने फैसले ले रही हैं. कई दूसरे जानकार भी मानते हैं कि यह कानून समुदाय की मर्जी को व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर रखता है और इस तरह से पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को बढ़ावा देता है.

इस कानून से क्या हो रहा है इसे उत्तर प्रदेश के एक हालिया उदाहरण से समझा जा सकता है. यहां के मुरादाबाद शहर से ताल्लुक रखने वाले एक मुस्लिम युवक और हिंदू युवती ने पड़ोसी राज्य उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में शादी कर ली. यह बीते जुलाई की बात है. इस कानून के बनने के बाद जब वे इस शादी का रजिस्ट्रेशन कराने मुरादाबाद जा रहे थे तो बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें पकड़ लिया और उनके साथ मारपीट की. इसके बाद पुलिस ने युवक और उसके भाई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया और युवती को शेल्टर होम पहुंचा दिया गया. बाद में युवती ने अदालत में बयान दिया कि वह बालिग है और उसने यह शादी अपनी मर्जी से की है. तब कहीं जाकर तीनों को छोड़ा गया. इस बीच शेल्टर होम में ही लड़की का गर्भपात हो गया.

इसी तरह पिछले साल के अंत में बिजनौर में एक बर्थ-डे पार्टी से घर लौट रहे एक लड़के और लड़की को कुछ लोगों ने पकड़ लिया और उनके साथ मारपीट की. जब पता चला कि लड़की हिंदू है और लड़का मुस्लिम तो उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाया गया जहां लड़के को इस कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. कथित तौर पर लड़की के पिता की तरफ से दर्ज करवाई गई एफआईआर में आरोप लगाया गया कि लड़का लड़की को अपने साथ भाग कर शादी करने और धर्म बदलने के लिए फुसला रहा था. हालांकि लड़की के पिता ने इससे इनकार किया है. द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उनका कहना था, ‘मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है. उसने क्या गलत किया….क्या एक लड़के और लड़की का साथ घूमना अब गलत है?’ लड़की के मुताबिक उसने भी मजिस्ट्रेट के सामने यही बयान दिया है कि वह अपनी मर्जी से उस लड़के के साथ घूम रही थी.

लखनऊ में तो दोनों परिवारों की मर्जी के बावजूद हाल में पुलिस ने एक शादी रुकवा दी. यहां भी हिंदू लड़की की एक मुस्लिम युवक से शादी का मामला था जिसकी राष्ट्रीय युवा वाहिनी नाम के एक संगठन ने पुलिस के पास शिकायत कर दी थी. इसके बाद पुलिस विवाह स्थल पर पहुंच गई और नए कानून का हवाला देकर तैयारियां रुकवा दीं. पुलिस का कहना था कि कानून के मुताबिक डीएम की इजाजत के बिना यह शादी नहीं हो सकती.

मुरादाबाद वाले मामले का हवाला देते हुए 100 से भी ज्यादा पूर्व नौकरशाहों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक चिट्ठी लिखकर इस कानून को रद्द करने की मांग की है. इनमें पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन और पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव भी शामिल हैं. इन सभी का कहना है कि इस कानून की आड़ में खुद को हिंदुत्व का रक्षक कहने वाले संगठन निर्दोष नागरिकों को डरा-धमका रहे हैं. मुरादाबाद की घटना का उदाहरण देते हुए चिट्ठी में लिखा है, ‘जब ये स्वघोषित रक्षक उस निर्दोष पति-पत्नी को परेशान कर रहे थे और उनसे सवाल पूछ रहे थे तो पुलिस चुपचाप खड़ी थी जो अक्षम्य है.’ इन पूर्व नौकरशाहों ने संभावना जताई है कि महिला का गर्भपात शायद इसी प्रताड़ना के चलते हुआ. उन्होंने लिखा है, ‘क्या यह एक तरह से उस अजन्मे बच्चे की हत्या नहीं है और क्या निष्क्रिय खड़ी आपके राज्य की पुलिस इस अपराध में भागीदार नहीं है?’

वरिष्ठ पत्रकार वेद प्रताप वैदिक का मानना है कि इस घटना ने लव-जिहाद के कानून के मुंह पर कालिख पोत दी है. वे एक और विसंगति की तरफ ध्यान खींचते हुए कहते हैं, ‘यह कानून लागू हुआ 28 नवंबर 2020 से और यह शादी हुई थी, 24 जुलाई को. यानी यह गिरफ्तारी गैर-कानूनी थी. इसके लिए किस-किस को सजा मिलनी चाहिए और किस-किस को उन पति-पत्नी से माफी मांगनी चाहिए, यह आप स्वयं तय करें.’

इसके चलते ही कई लोग मानते हैं कि यह कानून लाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने तानाशाही वाला बर्ताव किया है. योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी लिखने वाले पूर्व नौकरशाहों ने कहा है, ‘देश के लिए इससे बड़ा कोई खतरा नहीं हो सकता कि आप नागरिकों को ही एक दूसरे के खिलाफ कर दें. यह एक ऐसा टकराव है जिसमें सिर्फ देश के दुश्मनों का भला हो सकता है.’ उन्होंने इस कानून को अवैध बताते हुए न सिर्फ इसे रद्द करने बल्कि उन लोगों को उचित मुआवजा देने की मांग भी की है जिन्हें इसके चलते परेशानी हुई है. जस्टिस एपी शाह भी कहते हैं कि यह कानून तुरंत रद्द किया जाना चाहिए. उनका कहना है, ‘संविधान ने हमें जो आजादियां दी हैं उनका यह विनाश रोका जाना चाहिए. ये केवल न्यायपालिका ही कर सकती है.’

गौर करने वाली बात यह है कि यह सब तब हो रहा है जब हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि शादी दो लोगों की निजी पसंद का मामला है और हर बालिग युवती को अपना साथी चुनने का अधिकार है. हाई कोर्ट ने इस मामले में अपने पहले के ही एक फैसले को पलट दिया जिसमें कहा गया था कि सिर्फ शादी के लिए किया गया धर्म परिवर्तन अवैध है. जस्टिस एपी शाह का कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जो कानून बनाया है उसका आधार पहले का वही फैसला है जो अब पलटा जा चुका है.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गया है जिसने इस तरह के कानूनों को लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार से चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है. केंद्र को भी इस सिलसिले में नोटिस भेजा गया. सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन कानूनों पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन वह इनकी संवैधानिक वैधता की समीक्षा करेगा.

कई जानकारों के मुताबिक यह भी चिंता की बात है कि भारत में अदालतें भी लव जिहाद का दुष्प्रचार करने वालों का पक्ष लेती दिखी हैं. कुछ साल पहले केरल के हदिया मामले का ही उदाहरण लें. हिंदू परिवार में पैदा हुईं हदिया ने एक मुस्लिम युवक शफीन जहां से शादी के बाद 2016 में इस्लाम धर्म अपना लिया था और अपना नाम अखिला से बदल कर हदिया रख लिया था. उनके पिता अदालत में गए और आरोप लगाया कि यह धर्मांतरण बहला-फुसला कर किया गया है. केरल हाई कोर्ट में हदिया ने साफ कहा कि उन्होंने अपनी मर्जी से शादी और धर्मांतरण किया है. इसके बावजूद 2017 में हाईकोर्ट ने उनकी शादी को शर्मनाक करार देते हुए रद्द कर दिया. यही नहीं, हदिया को उसके माता-पिता के हवाले कर दिया गया. शफीन सुप्रीम कोर्ट गए. शीर्ष अदालत ने शादी रद्द करने के प्राथमिक मुद्दे पर सुनवाई के बजाय मामले की जांच एनआईए को सौंपकर एक और विवाद को जन्म दे दिया. हालांकि आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने हदिया के अधिकारों को स्वीकार कर लिया. बाद में अदालत ने वह जांच रिपोर्ट भी बिना पढ़े ही एनआईए को लौटा दी जिसे जांच एजेंसी ने छह महीने की पड़ताल के बाद तैयार किया था.

दिलचस्प बात यह भी है कि देश के किसी भी कानून में लव जिहाद शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है. न ही इससे जुड़ा कोई मामला किसी केंद्रीय एजेंसी के संज्ञान में आया है. यह बात खुद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने चार फरवरी 2020 को लोकसभा में दिए गए एक सवाल के जवाब में कही थी. उनका यह भी कहना था कि संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी धर्म को स्वीकारने, उसका पालन करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की आजादी देता है.

तो सवाल उठता है कि जब भाजपा की ही अगुवाई वाली केंद्र सरकार के मुताबिक लव जिहाद जैसा कुछ है ही नहीं तो भाजपा की ही सत्ता वाले राज्य इस तरह के कानून क्यों बना रहे हैं. कई जानकारों के मुताबिक इसका जवाब है विशुद्ध राजनीति. चारु गुप्ता के मुताबिक इस समय सत्ता में बैठी ताकतों को यह एक ऐसा मुद्दा लगता है जिसके जरिये जातीय भेदभाव की खाई पाटकर हिंदुओं को एकजुट किया जा सकता है और उसका राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता है. वे लिखती हैं, ‘अगर हम गोरक्षा का मुद्दा लें तो यह दलितों को आकर्षित नहीं करेगा. लेकिन औरतों का मुद्दा ऐसा है जिससे जाति को परे रखकर सभी हिंदुओं को लामबंद किया जा सकता है.’ उन सहित कई मानते हैं कि जबरन धर्मान्तरण की छानबीन होनी चाहिए और अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन, इस तरह की सभी घटनाओं को एक ही चश्मे से देखना गलत है.

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