समाज | जन्मदिन

बहादुर शाह ज़फ़र : दो गज़ ज़मीन की तलाश में जिसकी रूह आज दिल्ली में भटक रही होगी

आख़िरी मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की ख्वाहिश थी कि उसे हिंदुस्तान में दफ़नाया जाए

अनुराग भारद्वाज | 24 अक्टूबर 2021

सात नवंबर, 1862. सुबह के पांच बजे थे. गले में लकवे की मार के चलते 82 साल का अबू ज़फ़र दो दिन से कुछ खा पी नहीं पा रहा था. अधखुली आंखों से उसने रंगून की जेल की कोठारी की दीवारों पर नज़र डाली. पढ़ा नहीं जा रहा था पर ज़ेहन में सारे खाके खिंचे जा रहे थे. उसे सब याद आ गया और अफ़सोस हुआ कि वह यूं मर जाने के लिए क्यों पैदा हुआ.

उसे याद आया कि 11 मई 1857 की शाम जब को 3 कैवलरी (घुड़सवार) के बाग़ी सिपाही लाहौरी दरवाज़े से शाहजहांनाबाद (अब दिल्ली) में दाख़िल हुए तो उसके नाम का सितारा चमक उठा था. बाग़ियों ने लाल किले के नीचे पहुंच कर उसके नाम की गुहार लगाई और उससे हिंदुस्तान का बादशाह बनने की गुज़ारिश की. अबू जफर यानी बहादुर शाह जफर (द्वितीय) ने सैनिकों की इस गुहार पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. दिल्ली के लोग बागियों के साथ थे. उन्होंने उसे तोहमत दी कि यह हिंदुस्तान की तकदीर बदलने का वक़्त है, तोहमत दी कि इतिहास उसे याद रखेगा. उसे याद दिलाया कि वह मुग़लों का वंशज है, उसके पुरखे अकबर और औरंगजेब की रूहें उसे देख रहीं हैं. वे शर्मसार होंगी, अगर उसने अब भी कुछ नहीं किया.

रंगून की जेल की कोठरी में अबू को सब याद आ रहा था. जब सिपाही मेरठ से दिल्ली पहुंचे तो वह एकबारगी हक्का-बक्का रह गया और तुरंत ही उसने आगरा में मौजूद लेफ्टिनेंट गवर्नर को ख़बर पहुंचा दी. वह तय नहीं कर पा रहा था कि किसका साथ दे. बागियों के इसरार पर मजबूरन 82 साल का मुग़ल हिंदुस्तान का शहंशाह बन गया. उसके नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया, सिक्के गढ़े गए और फ़रमान जारी हुए. बागियों ने सबसे पहले शहर में मौजूद अंग्रेजों को काट डाला और इस तरह बहादुर शाह जफर के नाम का पन्ना इतिहास में लिख दिया गया.

यह वह मुकाम तो नहीं था जो अकबर या औरंगज़ेब को मिला था. कुछ ही दिनों में उसे महसूस हो गया कि बाग़ी अंग्रेजों के सामने ज़्यादा दिन नहीं टिक पाएंगे. सो उसने और बेगम ज़ीनत महल ने अंग्रेज़ों के साथ अपनी सुरक्षा की बातचीत शुरू कर दी. 19 सितंबर, 1857 को आख़िरकार दिल्ली में अंग्रेज़ फ़ौजें दाख़िल हो गईं.

कश्मीरी दरवाज़े पर तोप के गोलों के निशान

इत्तेफ़ाक कहें या कुछ और, हमला बोलने वालों में सिख इन्फेंट्री के जवान थे. अबू को याद आ गया कि उसके पुरखे औरंगज़ेब ने गुरु तेगबहादुर और उनके चेलों के सर काट दिए थे क्योंकि उन्होंने इस्लाम कुबूलने से इंकार कर दिया था. सिखों से रहम की उम्मीद करना अब बेवकूफ़ी होती. कश्मीरी दरवाज़े पर गोले बरसाए गए. वह टूट गया, जवान शहर में दाख़िल हो गए और उन्होंने लाल किले पर आसानी से कब्ज़ा कर लिया. अंग्रेज़ सैनिकों ने क़त्लेआम मचा डाला. सिख सैनिकों ने भी अपने पुरखों की मौत का बदला पूरा कर लिया. पर ज़फ़र और उसका परिवार लाल किले में नहीं था.

रंगून की कोठरी में लेटे हुए अबू ज़फ़र से अब सोचा भी नहीं जा रहा था. आगे फिर यूं हुआ होगा. ज़फ़र को पकड़े बिना, अंग्रेज़ों की जीत अधूरी थी. ज़फ़र और उसके ख़ासमख़ास हुमायूं के मकबरे में छुपे हुए थे. उसके सेनापति बख्त खान ने उसे लखनऊ निकल जाने की सलाह दी ताकि वहां रहकर जंग लड़ी सके. दूसरी ओर, ज़ीनत बेगम की राय थी कि उसे दिल्ली में रहकर अंग्रेज़ों से बातचीत करनी चाहिए. ज़फ़र नहीं भागा. शायद जंग नहीं चाहता था. उम्र आड़े थी या फिर हिम्मत और साज़ो सामान की कमी. शायद हिम्मत नहीं थी. तो क्या हुआ उसकी रगों में तैमूरी और चंगेज़ी खून था? आख़िरी मुग़ल कोई तैमूर लंग थोड़े ही था जिसमें 60 बरस की उम्र पर दुनिया में हंगामा करने की कुव्वत थी. कोई चंगेज़ खान थोड़े ही था जो 55 साल की उम्र पर दुनिया का सबसे खूंखार लड़ाका कहलाया गया. और न ही वह औरंगज़ेब था जो 80 साल की उम्र पर लड़ने का हौसला करता.

अगले दिन, यानी 20 सितंबर को अंग्रेज़ अफसर विलियम स्टीफन हडसन और सिख जवानों ने हुमायूं मकबरा घेर लिया. हडसन ने एलान करवाया कि अगर ज़फ़र ख़ुद को उसके हवाले कर देगा तो उसकी ज़िंदगी बक्श दी जाएगी और अगर उसने भाग निकलने की कोशिश की तो उसके पास हिंदुस्तान के बाग़ी बादशाह को गोली मार देने का हुक्मनामा है. हडसन ने यह भी कहा कि गिरफ़्तार किए जाने के बाद ज़फ़र के साथ बदसलूकी नहीं की जाएगी. कोई हलचल नहीं हुई. अगले दो घंटे दोनों तरफ़ बेचैनी थी. फिर जफर के गिने-चुने साथियों में से एक अहसानउल्ल्लाह खान मकबरे से बाहर आया. उसने हडसन से कहा कि कि बादशाह बाहर आकर उसके हवाले होने को तैयार है, बस बादशाह को वह ज़ुबान दे कि उसकी ज़िंदगी बख्श दी जायेगी. हडसन ने ज़ुबान दी.

अंग्रेजों की कैद में बहादुर शाह जफर

रंगून की कोठरी में अबू ने फिर आंखें खोलीं और पीने के लिए पानी मांगा. गले से आवाज़ ही नहीं निकली. उसे याद आया कि दिल्ली में उसे हुमायूं मकबरे से बाहर निकालकर कैदी बना लिया गया और फिर शुरू हुआ था उसकी ज़लालत का सिलसिला. उसे बेगम ज़ीनत महल की हवेली ले जाया गया जहां उसके साथ अंग्रेज़ सिपाही बेहद बदतमीजी से पेश आए. उसे ‘सूअर’ तक कहा गया. मेजर हडसन अगले दिन फिर हुमायूं के मकबरे में गया और ज़फ़र के तीनों बेटों को बिना किसी शर्त कैदी बना लाया. दिल्ली में दाख़िल होने से पहले तीनों को नंगा किया गया और गोलियां मार दी गईं. हादसे को हुए पांच साल गुज़र चुके थे. रंगून की जेल की कोठरी में बंद अबू की आंख के आंसू अब सूख चुके थे.

उस पर मुकद्दमा चलाया गया. सरकार के वकीलों ने दलील दी कि हिंदुस्तान का मुसलमान बादशाह दुनिया के अन्य मुसलमानों के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ साज़िश का गुनाहगार है. फ़ैसला सरकार के हक़ में हुआ. ज़फ़र गुनाहगार ठहराया गया. क्या विडंबना थी. बादशाह अपने ही देश में विदेशियों का गुनाहगार हो गया! अगर हडसन उसकी जान की सलामती की ज़ुबान न देता, तो ज़फ़र को इस जुर्म में मार दिया जाता. फ़ैसला हुआ कि जल्द से जल्द उसे हिंदुस्तान से बाहर ले जाया जाए.

सात अक्टूबर, 1858 की सुबह के चार बजे थे. ज़फ़र को जेल में उठाकर हुक्म सुनाया गया कि उसे उसके मुल्क से बाहर ले जाया जा रहा है. पर कहां, यह नहीं बताया गया. रंगून की जेल की कोठरी में बंद अबू ज़फ़र को सब याद आ गया था.

सूरज निकल तो आया था पर उसकी रोशनी कोठरी की दीवारों को चीर नहीं सकती थी. बंद होने से पहले अबू ज़फ़र की आंखें कुछ ज़्यादा फ़ैल गईं. दिए की रोशनी में उसे दीवारों पर लिखी इबारत नजर आई. उसने ही तो लिखा था ‘कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए, दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में.’ गले में से हिचकी की भी आवाज़ न आई, उसने आंखें मूंद लीं. 350 साल की मुग़ल सल्तनत के इतिहास का आख़िरी पन्ना बंद हो गया.

ज़फ़र की मौत के बाद, ब्रिटिश मशीनरी हरकत में आ गयी. सरकार की चाल थी कि हिन्दुस्तान ख़बर पहुंचने से पहले उसका नामोनिशान मिटा दिया जाए. उसे ऐसी जगह दफ़नाने की राय बनी जहां कोई ढूंढ न पाए. उसकी कोठरी के पीछे ही शाम के चार बजे रंगून में उसे दफ़ना दिया गया. कुछ दिनों में कब्र के आसपास घास उग गयी और सब ख़त्म हुआ मान लिया गया.

सब यूं ही ख़त्म नहीं जो जाता. बहादुर शाह जफर हिंदुस्तान का आख़िरी बादशाह था. वह लड़ न पाया तो क्या. वह दरवेश था, सूफ़ी था, शायर था, ग़ालिब का शागिर्द था और सबसे बड़ी बात, वह मज़हबी नहीं था. उसके लगभग सभी पुरखे यहीं दफ़न हैं. उसकी इच्छा भी यहीं की मिट्टी में मिलने की थी.

कुछ समय मांग हुई थी कि ज़फ़र की अस्थियों को रंगून से लाकर यहां दफ़न किया जाए. ऐसी आवाजें पहले भी उठी हैं. उसके ही हक़ में नहीं. सुभाष चंद्र बोस के परिवार वाले भी चाहते हैं कि बोस की अस्थियां जापान से हिंदुस्तान लाई जाएं. चाह है पर फिलहाल राह नहीं दिखती.

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