धर्म

समाज | कभी-कभार

हिन्दू धर्म के संकट में होने के अहसास का अभाव इस संकट को दोहरा करता है

हिन्दू धर्म के लिए यह संकट उसके धर्मनेताओं और अनुयोयियों ने, राजनीति ने पैदा किया है, किसी अन्य धर्म या उनके लोगों ने नहीं

अशोक वाजपेयी | 09 जनवरी 2022 | फोटो: पिक्साबे

‘तमाशा-ए-अहले-करम’

फिर कुछ राज्यों में विधान सभा चुनाव होने जा रहे हैं. फिर झूठों और वायदों का अंबार, शिखर से अतिशयोक्ति और अमर्यादित वक्तव्य, वहीं से हिन्दू-मुसलमानों के बीच तीख़ा ध्रुवीकरण, खुलेआम धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा, केन्द्रीय निज़ाम की सरकारी एजेंसियों द्वारा विपक्ष के नेताओं या उनके निकट समझे जानेवाले व्यक्तियों पर नाटकीय ढंग से छापे, क़ानून के हिसाब से आचरण करने में पुलिस की अनिच्छा, बाहुबल-धनबल का नंगा प्रदर्शन आदि हो रहे हैं और अगले कुछ महीने होने जा रहे हैं.

कोविड-19 की नयी लहर के बावजूद सभाओं और रैलियों को नियंत्रित करने का कोई प्रयत्न नहीं हो रहा है. संबंधित सभी राज्यों में गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, हिंसा, हत्या आदि बढ़ी हैं पर इन मुद्दों पर चुनाव लड़े जाने की कोई संभावना नज़र नहीं आ रही है. यों तो चुनाव, भारत में, हमेशा से एक तरह का तमाशा होते आये हैं: इस बार यह तमाशा ख़ासा क्रूर होने जा रहा है. गोदी मीडिया, बहुत ज़ोर-शोर से, इस तमाशे को टुच्चा-हलका, अतिवादी बनाने में पूरी निष्ठा से लग गया है. उदारचरित लोग भी यह राग अलापने लगे हैं कि कोई विकल्प नहीं है. विशाल मध्यवर्ग लोकतंत्र के इस लगभग दैनिक पतन को अनदेखा कर रहा है और उसमें संविधान की समझ और लोकतंत्र के संकट का अहसास सिरे से ग़ायब हैं. उसकी सामाजिक चेतना और सामाजिक ज़िम्मेदारी का भाव बेहद शिथिल और निष्क्रिय हो गये हैं. बुद्धि और ज्ञान के निरन्तर अवमूल्यन को लेकर बौद्धिक और ज्ञानी समाज उद्वेलित या क्षुब्ध है इसका कोई प्रमाण नज़र नहीं आता. उनकी संस्थाओं में स्वायत्तता और स्वतंत्रता में लगातार कटौतियां हो रही हैं और वे, कम से कम दृश्य प्रतिरोध नहीं कर रहे हैं.

पिछले दो वर्ष कोरोना प्रकोप और उससे ज़रूरी हुए अलगाव में बीते हैं. तीसरी लहर आ गयी है और कई तरह की बंदिशें लगना शुरू हो गया है. कई बार लगता है कि हम सत्ता के प्रकोप और कोरोना प्रकोप के बीच फंस गये हैं.

ऐसा मानना कठिन भले हो पर लगता है कि इस फंसाव का एक दुष्परिणाम यह है कि हम धीरे-धीरे हिंसा-हत्या-बलात्कार-घृणा-अन्याय को अपरिहार्य मानकर उन्हें या तो स्वीकार करने की ओर बढ़ रहे हैं या कि ये बातें हमें विचलित नहीं कर पा रही हैं. हम एक तरह के स्वार्थी कोकून में रहने लगे हैं और उस कोकून में उपलब्ध गरहमाहट हमारी संवेदना की तीक्ष्णता को कुन्द कर रही है. हम सभी अपने-अपने काम में लगे हैं, हमारे अपने सुख-दुख हैं, हमारी अपनी आकांक्षाएं और अपेक्षाएं हैं और उनके घेरे से बाहर निकलकर संविधान, लोकतंत्र, समाज की चिंता करना हमें ज़रूरी नहीं लगता. हिन्दी भाषियों को इसकी रत्तीभर चिन्ता नहीं है कि हर दिन उनकी भाषा में घृणा-अन्याय-झगड़ालूपन-झूठ भरे जा रहे हैं और यह प्रदूषण उनकी भाषा को कितना क्षत-विक्षत करेगा इसकी परवाह करने का उनके पास समय नहीं.

अधर्म-असंसद

मौजूदा निज़ाम की एक बड़ी और लगभग स्थायी लगती उपलब्धि यह है कि उसने हिंसा और अतिचार को एक सम्मानजनक कार्रवाई बना दिया है. ऐसा कोई क्षेत्र या तबका नहीं बचा है जहां यह हिंसा और अत्याचार न हो रहा हो. यह सिर्फ़ राजनीति तक महदूद नहीं है: अब समाज, संवैधानिक संस्थाओं, पुलिस बल, मीडिया आदि में वह लगभग दैनिक रूप से, अबाध हो रहा है. राजनीति और सत्ता से धर्मों का संबंध पुराना है और कभी वह सर्जनात्मक भी होता था. अब धर्म, ख़ासकर हिन्दू धर्म, सत्ता और राजनीति का अनुगमन बहुत उत्साह से निस्संकोच और निडर रहकर कर रहा है. धर्म का एक आध्यात्मिक और शाश्वत पक्ष भी होता आया है. यही उसका सत्व भी माना जाता रहा है. अब यह पक्ष पूरी तरह से दबा दिया गया है. राजनीति की तरह धर्म भी अवसरवादी हो गया है. वह झूठ बोलने, घृणा फैलाने, भेदभाव बरतने और हिंसा से गुरेज़ न करने में राजनीति का अनुचर हो गया है. इस पर विवाद हो सकता है कि कभी धर्म ने सत्ता और राजनीति को रास्ता दिखाया है पर यह निर्विवाद है कि आज धर्म राजनीति के पीछे चल रहा है.

हरिद्वार की पावन नगरी में हाल ही में एक धर्मसंसद नाम का आयोजन हुआ. उसमें हिन्दू धर्म के ही नेता शामिल हुए. उसमें भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुसलमानों के नरसंहार का आह्वान किया गया जबकि ये सभी भारतीय संविधान के अन्तर्गत भारतीय नागरिक हैं और उन्हें सभी संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं. इस अधर्मी और असंसदीय आह्वान को करनेवालों के विरुद्ध बहुत अनिच्छा से शुरू की गयी कार्रवाई मन्द गति से चल रही है जबकि यह सीधे-सीधे देशद्रोह का मामला है. दुखद यह है कि देश के शीर्षस्थ पदाधिकारियों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की है. व्यापक हिन्दू वर्ग इस अनाचार को लेकर व्यथित है इसका भी कोई प्रमाण नहीं है. जिस समाज को अपने ऐसे अनाचारी अधर्मी असंसदीय धर्मनेताओं पर शर्म आना चाहिये वह समाज चुप है. वह अपने धर्म की इतनी अधार्मिक व्याख्या होते देख भर रहा है. इधर क्रिसमस के आसपास कई जगहों पर ईसाई धर्मस्थलों ईसा की मूर्ति आदि को खण्डित किया गया है. यह शायद दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय को सन्देश है कि अब भारत में वे दूसरे दर्जे़ के नागरिक की तरह ही रह पायेंगे. कई जगहों पर कुछ पुलिस कार्रवाई दिखावे के तौर पर हुई है और तफ़तीश ऐसे की जायेगी कि सभी अपराधी, पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में, न्यायालय से छूट जायेंगे.

हमारी परम्परा में कई बार लोग-वीर-योद्धा-नायक-नायिका धर्मसंकट में पड़ते हैं. पर इस बार स्वयं धर्म संकट में है. शायद यह ऐसा संकट है जिसको उसके अधिकांश अनुयायी संकट के रूप में देख-समझ नहीं पा रहे हैं. इस अहसास का अभाव इस संकट को दोहरा करता है. हिन्दू, जो कि इस देश में बहुसंख्यक हैं, किसी संकट में नहीं हैं, भले आज की सत्तारूढ़ राजनीति उन्हें यह क्यों न समझा रही हो. पर हिन्दू धर्म संकट में है और उसका यह संकट उसके धर्मनेताओं और अनुयोयियों ने, राजनीति ने पैदा किया है, किसी अन्य धर्म या उनके लोगों ने नहीं.

सागर से नेरूदा

यह करीब 60 से अधिक बरसों पहले की बात है. मैं सागर विश्वविद्यालय में बीए का छात्र था. तभी वहां के पुस्तकालय से रिल्के, पास्तरनाक, हिकमत, नेरूदा, बोदेलेयर आदि की कविताएं अंग्रेज़ी अनुवाद में पढ़ने का सुयोग हुआ था. विश्वविद्यालय तब मकरोनिया की सैनिक बैरकों में लगता था. अब वहीं मकरोनिया के पास रहनेवाली अंग्रेज़ी के एक अध्यापक विनीत मोहन औदिच्य के नेरूदा के सौ सानेट की, हिन्दी में अनूदित, ‘ओ प्रिया!!!’ ब्लेक ईगल बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक मिली.

अनुवाद समझ और सावधानी, संवेदनशीलता और मर्मस्पर्श से किये गये हैं. मूल का संगीत शायद न आ पाया हो पर अनुवाद में हिन्दी का अपना संगीत चरितार्थ हुआ है. कुछ अंश देखिये:

  1. अग्नि ने सिखाया है तुम्हें रक्त का पाठ,
    आटे से सीखी है तुमने अपनी पवित्रता,
    रोटी से जानी है अपनी भाषा और सुगन्ध.

2. ईर्ष्या पाती है कष्ट, होती है समाप्त, थका देते हैं उसे मेरे गीत
एक एक करके इसके दुखी नायक रहते हैं चिन्तित और पाते हैं मृत्यु,
मैं कहता हूं प्रेम, और यह जग भर जाता है, कपोतो से.
मेरा प्रत्येक शब्दांश होता है वसंत के आगमन में सहायक.

3. जनवरी मास है कठिन समय, जब उदास दोपहर
बनाती है अपना समीकरण आकाश में.
एक प्याले में मदिरा सी, एक कठोर सुवर्ण
भर देता है धरा को उसकी नीली सीमाओं तक.

4. निर्वस्त्र, तुम हो सहज अपने हाथों में एक सी
स्निग्ध, धरा सी, नन्हीं, पारदर्शी, वृत्ताकार:
तुम्हारे पास हैं चन्द्रमा की लकीरें, सेब-गलियारे
निर्वस्त्र, तुम हो छरहरी एक नग्न गेहूं के दाने सी.

5. तब वहां नहीं होगी तुम, न मैं न कोई प्रकाश,
और फिर भी धरा के परे, इसके धुंधलाते अन्धकार में
हमारे प्रेम की भव्यता रहेगी जीवित.

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