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क्यों इस्लाम को आधुनिक नजरिये से न देखना अब कोई विकल्प ही नहीं है

मुसलमानों के नजरिये में तब तक बड़ा बदलाव नहीं आएगा जब तक वे उन धर्मशास्त्रों पर गंभीरतापूर्वक पुनर्विचार नहीं करते जिन्होंने उन्हें सदियों से बेड़ियों में जकड़ा हुआ है

ए फैज़ुर रहमान | 06 मार्च 2021 | फोटो: पिक्साबे

इसी साल 30 जनवरी को द वाशिंगटन पोस्ट में एक ऐसी खबर छपी जो मुस्लिम सुधारवादियों के लिए किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं थी. खबर यह थी कि सऊदी अरब ने अपनी पाठ्यपुस्तकों से यहूदी, समलैंगिक और स्त्री विरोधी सामग्री हटा दी है.

जो हिस्से हटाए गए, उनमें समलैंगिकों को मौत की सजा का समर्थन था. साथ ही इनमें अतिवाद की राह पर चलते हुए शहादत की परम प्रशंसा थी और इसे इस्लाम की सबसे बड़ी इच्छा और आकांक्षा बताया गया था. इन हिस्सों में कुरान की आयतों की गलत व्याख्या करते हुए पुरुषों को महिलाओं से श्रेष्ठ बताया गया था और घरेलू हिंसा को सही ठहराया गया था. साथ ही इनमें पैगंबर के हवाले से कहा गया था कि कयामत यानी सबके हिसाब-किताब का दिन तब तक नहीं आएगा जब तक मुस्लिमों द्वारा सभी यहूदियों को खत्म नहीं कर दिया जाता.

धर्मशास्त्रीय नजरिये से देखें तो सऊदी अरब का यह कदम यकीनन सुन्नी इस्लाम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव का मोड़ है और सभी मुसलमानों को इसका स्वागत करना चाहिए. जिस इस्लाम का संदेश पैगंबर मोहम्मद ने दिया था उसका कभी भी यह मतलब नहीं था कि एक ही विचारधारा का वर्चस्व हो. यह एक समतावादी सामाजिक व्यवस्था (दीन) थी जिसकी कोशिश यह थी कि उसके सौहार्दपूर्ण आलिंगन में समूची मानवता शामिल हो. इस पर जोर देने के लिए कुरान ने ईश्वर को रब-उल-आलमीन (समूची मानवता को प्यार करने वाला) और पैगंबर को रहमत-उल-लील आलमीन (जिसके पास पूरी दुनिया के लिए प्रेम और करुणा है) कहा है.

कुरान में न तो मुसलमान को इस तरह परिभाषित किया गया है कि वह दूसरी संस्कृतियों को स्वीकार ही न करे और न ही इस्लाम को ऐसे पंथ के रूप में पेश किया गया जो जान लेकर ही संतुष्ट होता है. इस्लाम तो शांति का घर यानी ‘दार-अस-सलाम’ था और मुसलमान वह शख्स जो अंधेरे से उजाले में आने के लिए शांति के रास्ते पर चले. (10:25, 5:16).

इस्लाम यहूदी विरोधी नहीं

अफसोस की बात रही कि यह सार्वभौमिकता ज्यादा समय तक नहीं चली. पैगंबर के निधन के बाद इस्लामी नेतृत्व विस्तारवाद और इस धारणा पर जोर देने लगा कि वह दुनिया के लिए मसीहा बनकर आया है. खास कर 651 ईसवी में मुआविया द्वारा स्थापित उमैय्यद खिलाफत ने प्रतिद्वंद्वी कबीलों और समुदायों को ‘हम और वे’ के रूप में परिभाषित करने का अभियान छेड़ दिया. इसके लिए पैगंबर की ऐसी बातों (हदीस) को जरिया बनाया गया जो उन्होंने कभी कही ही नहीं थीं. मकसद साम्राज्यवादियों की वंशवादी महत्वाकांक्षाओं को धर्मशास्त्रों का हवाला देकर मजबूत करना था. पैगंबर के यहूदी विरोधी बयान भी शायद इसी समय के दौरान गढ़े गए.

पैगंबर के ऐसे बयान देने की संभावना को सरलता से खारिज किया जा सकता है. इसका आधार यह तथ्य है कि न तो उन्होंने और न ही कुरान ने किसी समुदाय को नीची नजर से देखा. बल्कि इसके उलट कुरान दो जगहों (2:62 और 5:69) पर मुसलमानों, यहूदियों, ईसाइयों, सबीयनों (एक अन्य तत्कालीन धार्मिक समूह) और ऐसे किसी भी शख्स को अल्लाह की तरफ से ईनाम मिलने की बात करती है जो मानता है कि ईश्वर के प्रति उसकी एक जवाबदेही है और जो अच्छे काम करता है. इससे इस्लाम की समावेशी प्रकृति का पता चलता है. यही नहीं, कुरान मठों, चर्चों और यहूदी उपासनागृहों यानी गैरमुस्लिमों के पवित्र स्थलों की सुरक्षा को भी जरूरी बताती (22:40) है क्योंकि उनके परिसरों में बार-बार ईश्वर का नाम लिया जाता है.

पैगंबर ने तो यहूदियों को मुस्लिम उम्मा (समुदाय) के बड़े स्वरूप के भीतर ही शामिल किया था. ऐसा उन्होंने इस समुदाय के साथ 622 ईस्वी में मीसाक-ए-मदीना नाम के समझौते पर दस्तखत करके किया था. इसलिए फिलिस्तीनियों पर इजराइल के जुल्म की निंदा और पूरे यहूदी समुदाय को इस्लाम का दुश्मन मानने की बात में बहुत बड़ा फर्क है. पहली बात न्यायसंगत है जबकि दूसरी गलत. इजराइल के भीतर और बाहर बहुत सारे यहूदी हैं जो इस्लाम के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखते और यहूदी अतिवाद का समर्थन नहीं करते.

मुस्लिम जगत में महिलाओं की दशा

कुरान में जो समतावाद था उसे दबाने का नतीजा मुस्लिम जगत में स्त्रियों के दमन की कुप्रथा के रूप में भी सामने आया. दरअसल पुरुष प्रधान विचारों के समर्थक उलेमाओं ने सदियों से धर्म की अंतिम व्याख्या करने का अधिकार हथियाया हुआ है. वे इस्लाम की व्याख्या एक ऐसे पितृसत्तामक धर्म के रूप में करते आ रहे हैं जिसमें स्त्रियां पुरुष की इच्छा के अधीन हैं.

महिलाओं को कमतर मानने के इस विचार का सबसे बर्बर पहलू यह विश्वास है कि ईश्वर ने पुरुषों को अपनी पत्नियों के साथ मारपीट करने का हक दिया है. इस नजरिये की नैतिक रूप से पड़ताल का शायद ही कभी कोई प्रयास हुआ हो. यह धारणा कुरान की एक आयत (4:34) की गलत व्याख्या पर आधारित है. इस साल पद्मविभूषण पाने वाले मौलाना वहीदुद्दीन खान इसका अनुवाद इस तरह करते हैं, ‘…उन्हें (पत्नियों) जिनसे आपको बेवफाई का अंदेशा हो, डांटिए, इसके बाद उनके साथ बिस्तर साझा करने से इनकार कीजिए, और आखिर में उन पर हाथ उठाइए (हल्के से).’

इस अनुवाद में ‘हल्के’ से शब्द जोड़ना इस आयत की व्याख्या को हिंसात्मक होने से बचाने की कोशिश लगता है. यह संकेत है कि मौलाना के मन में अपने अनुवाद को गलत तरह से लिए जाने का अंदेशा था. आखिर किसी को यह यकीन कैसे हो सकता है कि अल्लाह पुरुषों से अपनी पत्नियों के साथ सिर्फ ‘हल्के से’ मारपीट की अपेक्षा रखता है खास कर जब यह शब्द अरबी में लिखी कुरान में है ही नहीं? तथ्य यह है कि कुरान पत्नी के साथ मारपीट की इजाजत नहीं देती. इस मुद्दे पर एक विस्तृत जानकारी के लिए पाठक मेरा एक पुराना लेख पढ़ सकते हैं.

इसी तरह यह विश्वास, कि इस्लाम पुरुषों को महिलाओं से ऊपर मानता है, कुरान और हदीस की गलत व्याख्याओं पर आधारित है. जैसे वह जिसमें कहा गया है कि महिलाएं बौद्धिक और इस्लामिक, दोनों लिहाज से कमतर हैं और दोजख में वे पुरुषों से ज्यादा संख्या में होंगी और उसकी वजह होगी उनकी खराब जुबान और अपने पतियों के प्रति उनकी अकृतज्ञता. (किताब अल-हैज, सहीह बुखारी)

यह हैरान करने वाला है कि ऐसी बातें कहने वाले धर्मगुरू एक पल के लिए भी ठहरकर यह नहीं सोचते कि कुरान में लैंगिक समानता वाली आयतें सुनाने वाले पैगंबर भला महिलाओं के प्रति ऐसा नजरिया कैसे रख सकते थे. ये आयतें न सिर्फ यह ऐलान करती हैं कि जिम्मेदारियों और अधिकारों के मामले में पति और पत्नी में कोई फर्क नहीं (2:228) है बल्कि वे एक पुरुष और महिला के बीच बीच शांति की खोज वाली एक सहयोगात्मक साझेदारी (विलायत) की बात कहती हैं जिसमें अच्छे कामों के लिए समर्थन हो और बुरे कामों के लिए विरोध (9:71). तो यह यकीन कि इस्लाम पुरुषों को महिलाओं से ऊपर मानता है कुरान की गलत व्याख्या और उन संदेहास्पद हदीसों की वजह से है जिन्हें बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया गया.

यही वजह है कि सऊदी सरकार की इसके लिए तारीफ की जानी चाहिए कि वह स्कूली बच्चों को कुरान की गलत व्याख्याओं और अप्रमाणिक हदीसों के बुरे प्रभावों से बचाने के लिए कदम उठा रही है. हालांकि यह काफी नहीं है. दरअसल मुसलमानों के नजरिये में एक बड़ा बदलाव तब तक नहीं आएगा जब तक वे उन धर्मशास्त्रों पर गंभीरतापूर्वक पुनर्विचार नहीं करते जिनमें दूसरों के हितों से अलग रहने की बात है, जिन्होंने मुस्लिम समुदाय को सदियों से बेड़ियों में जकड़ा हुआ है और जिन्होंने गैरमुस्लिमों को गलत अनुवाद का इस्तेमाल करके काफिर और मुशरिक कहकर अलग कर दिया है.

इंडोनेशिया के इस्लाम विद्वान याहया छोलिल स्ताकुफ ने ठीक ही कहा है कि इस्लामिक शिक्षाओं में परिवर्तन लाया जाना चाहिए और यह काम इस्लाम के शांतिवादी पहलुओं को आगे लाकर किया जाना चाहिए जिससे धार्मिक बहुलतावाद और इंसान की बुनियादी गरिमा के प्रति सम्मान को प्रोत्साहन मिले. इसके लिए पुराने पड़ चुके मदरसों के पाठ्यक्रम को बदलना होगा ताकि इस्लाम को अपने मूल स्रोतों के दायरे में ही आधुनिक व्याख्याओं के लिए खोला जा सके, मुसलमानों में अलग-अलग नजरियों के लिए सहिष्णुता का भाव विकसित हो सके और वे उन बहुसांस्कृतिक समाजों की जरूरतों के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया दे सकें जिनमें वे रहते हैं.

अगर मुसलमान अपनी स्वतंत्रता पर जोर दे सकें और किसी दूसरे ही दौर में जी रहे इस्लाम के सरपरस्तों पर यह दबाव डालने में कामयाब हों कि वे अपने विचारों में आधुनिकता लाएं तो गैरमुस्लिम जगत के साथ उनके एक बड़े बदलाव वाले रिश्ते की शुरुआत हो सकती है. एक ऐसा रिश्ता जिसमें टकराव के बजाय सहयोग होगा और इस्लाम के प्रति पूर्वाग्रह की जगह आपसी भरोसा ले लेगा.


ए फैजुर रहमान ‘इस्लामिक फोरम फॉर द प्रमोशन ऑफ मॉडरेट थॉट’ के सेक्रेटरी जनरल हैं. यह लेख स्क्रोल.इन में छपे उनके लेख का भावानुवाद है. उनका ईमेल पता [email protected] और ट्विटर हैंडल @FaizEngineer है.

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