समाज | सिर-पैर के सवाल

नीले को पुरुषों और गुलाबी को महिलाओं का रंग बताने वाला यह रंगभेद आया कहां से?

सवाल जो या तो आपको पता नहीं, या आप पूछने से झिझकते हैं, या जिन्हें आप पूछने लायक ही नहीं समझते

अंजलि मिश्रा | 02 जनवरी 2022

जब हमें बच्चों के लिए कपड़े चुनने में, खासकर रंगों को लेकर दुविधा होती है तो एक कसौटी हमारे लिए यह मुश्किल तुरंत आसान बना देती है. यह बिलकुल आम प्रवृत्ति है कि हम में से ज्यादातर लोग लड़के लिए नीला या उसके आसपास और लड़की के लिए गुलाबी या उससे मिलते-जुलते किसी रंग की ही ड्रेस को प्राथमिकता देते हैं. लेकिन क्या कभी आपका ध्यान उस वजह की तरफ जाता है जिसने हमें यह आसानी मुहैया कराई है, जिसके बूते हमने अपने या बच्चों के लिए रंगों का बंटवारा कर लिया है.

यदि हम सामान्य तर्क के आधार पर सोचें और जिसपर ज्यादातर लोग सहमत भी दिखेंगे तो ऐसा लगता है कि लड़कियों से गुलाबी रंग को जोड़ने के पीछे इस रंग के नाजुक होने के विचार की बड़ी अहम भूमिका है. गुलाबी आंखें, गुलाबी गाल या गुलाबी मिजाज ये सारी चीजें हमेशा से लड़कियों से जुड़ी रही हैं. फिर भी यहां पर कहना जरूरी हो जाता है कि सारी लड़कियां ताउम्र गुलाबी रंग की दीवानी नहीं होती. किशोरवय की उम्र में कदम रख रही लड़कियां कभी फैशन से प्रभावित होकर, तो कभी अपनी ही सहेलियों की देखा-देखी इस रंग के प्रति अपना आग्रह दिखाती हैं. बाद में परिपक्वता आने के साथ-साथ यह शौक भी हवा होता दिखाई देता है.  

जिस सामान्य तर्क का हमने ऊपर सहारा लिया उसी का दूसरा पक्ष कहता है कि लड़के इस रंग को प्राथमिकता नहीं देंगे. हम पुरुषवादी समाज में रहते हैं जहां ‘लड़कियाना’ रंग के कपड़े पहनना पुरुषों के लिए मजाक का विषय बन सकता है. गुलाबी मतलब नाजुक और थोड़ा और विस्तार दें तो कह सकते हैं यह रंग लचीलेपन को भी दर्शाता है.

लड़के एक उम्र तक तो लाल-पीला-गुलाबी कुछ भी पहनते हैं लेकिन जब उनमें परिपक्वता आने लगती है कि तो वे इन रंगों से परहेज करने लगते हैं. उनका झुकाव नीले और इसके करीबी रंगों की तरफ हो जाता है. इसकी बड़ी वजह यह है कि इस रंग को लचीलेपन से उलट गंभीरता और औपचारिकता से जोड़ दिया गया है. किशोर से युवा हुआ पुरुष जीविकोपार्जन के लिए बाहर निकलता है. उसे पेशेवर दिखना होता है. इसके लिए विकल्प के तौर पर उनके पास सिर्फ सफ़ेद और नीले रंग होते हैं. सफेद का दोहराव करने के बजाय नीले रंग के साथ प्रयोग की ज्यादा गुंजाइश होती है. यह भी एक वजह है जो पुरुषों के बीच इसे लोकप्रिय बनाती है.

इस सर्वस्वीकृत सोच का मतलब यह नहीं है कि रंगों का बंटवारा हमेशा से ऐसा था. बीसवीं सदी की शुरुआत में रंगों का विभाजन बिलकुल उल्टा था. हांगकांग से छपने वाली महिलाओं की पत्रिका ‘होम जरनल’ के उस समय के कई आलेख इस बात की तस्दीक करते हैं. पत्रिका के एक आलेख से पता चलता है कि तब गुलाबी रंग लड़कों और नीला रंग लड़कियों के लिए उपयुक्त समझा जाता था.

पत्रिका के एक आलेख के मुताबिक गुलाबी कहीं ज्यादा स्थायित्व और अपेक्षाकृत मजबूती का प्रदर्शन करने वाला रंग है इसलिए यह पुरुषों के लिए सही है. वहीं नीला रंग ज्यादा नाजुक और सजीला है सो इसे महिलाओं के शोख और कोमल होने से जोड़ा जा सकता है. उस दौर में छपे कई लेखों से पता चलता है कि नीले रंग के चटख होने के कारण महिलाएं इसे ज्यादा पसंद करती थीं. वहीं गुलाबी रंग को पसंद करने वाले पुरुषों का तर्क था कि यह रंग आरामदायक है और आंखों में चुभता नहीं है.

पिछली शताब्दी का चौथा दशक आते-आते यह मामला ठीक उलटा यानी आज की तरह हो गया. ऐसा क्यों हुआ इतिहासकार भी इसकी कोई मजबूत वजह नहीं बता पाते. ऐसा माना जाता है कि ‘जेंडर कलर पेयरिंग (पुरुष या स्त्री को रंगों से जोड़कर देखा जाना) ’ की अवधारणा फ्रैंच फैशन की देन है. जेंडर कलर पेयरिंग – यह शब्दावली लिंग और रंग के समन्वय के लिए ईजाद दी गई है – जैसे गुलाबी यानी महिलाएं. पेरिस को दुनियाभर की फैशन राजधानी कहा जाता है. उस दौर में महिलाओं के लिए गुलाबी और पुरुषों के लिए नीले रंग के करीबी रंगों की पोशाकों को प्राथमिकता दी जाने लगी थी. कहते हैं कि फिर यह चलन फ्रांस से निकलकर दुनियाभर में पहुंच गया. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि तब यह फैशन से जुड़े किसी प्रयोग का हिस्साभर रहा हो जो लोकप्रिय होने के बाद एक प्रचलित मान्यता बन गया.

फ्रांस के फैशन जगत में रंगों का यह बंटवारा होने के पहले महिलाओं और पुरुषों के रंग चयन करने की प्रवृत्ति को समझने के लिए 1927 में टाइम मैगजीन ने एक सर्वे किया था. इस सर्वे में दुनियाभर के अलग-अलग शहरों के स्टोर्स शामिल थे. इसके नतीजों को मिलाजुला कहा जा सकता है फिर भी सर्वे के अंत में पत्रिका यह कहने की स्थिति में आ चुकी थी कि वर्णक्रम के एक हिस्से की तरफ पुरुषों का ज्यादा झुकाव होता है तो दूसरे हिस्से की तरफ महिलाओं का. इन नतीजों के मुताबिक पुरुष वर्णक्रम के एक तरफ स्थित नीले, हरे और जामुनी रंगों को तवज्जो देते हैं तो महिलाओं का झुकाव वर्णक्रम के दूसरे सिरे की तरफ होता है. इस सिरे पर लाल और उसके करीबी रंग पाए जाते हैं.

इस सर्वे में ग्राहकों को अलग-अलग समूह में बांटा गया था. इसके नतीजों से पता चला कि एक समूह के सदस्य अपने ही समूह के अन्य सदस्य से मिलती-जुलती लेकिन दूसरे समूह से एकदम भिन्न राय रखते हैं. लेकिन समूह का हर सदस्य किसी निश्चित रंग को ही पसंद करेगा ऐसा नहीं है. लोग किन रंगों को पसंद कर रहे हैं इसमें उनकी उम्र, व्यवसाय और पृष्ठभूमि भी मायने रखती है. आज के समय से तुलना करें तो लगता है कि इस सर्वे के नतीजे सही थे.

बाद में यह बात 2007 में हुए एक वैज्ञानिक प्रयोग से भी सिद्ध होती दिखी. तब इंग्लैंड की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ आन्या हर्लबर्ट और याज्हू लींग ने 20 से 26 साल आयुवर्ग के 206 युवाओं पर एक प्रयोग किया. इस प्रयोग में उन्होंने स्पेक्ट्रम को दो हिस्सों में बांटा. पहले वर्ग में लाल, नारंगी, पीले और हरे रंग को रखा गया. दूसरे वर्ग में बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा और पीला रंग रखे गए. स्पेक्ट्रम के इस बंटवारे के पीछे कोई वैज्ञानिक वजह न होकर यही सामाजिक मान्यता थी जो गुलाबी या चटक रंगों को महिलाओं से और नीले या गहरे रंगों को पुरुषों से जोड़ती है.

इस प्रयोग में शामिल महिलाओं और पुरुषों के मस्तिष्क से ऐसी डिवाइस जोड़ी गई थीं जो किसी उनके मस्तिष्क की सक्रियता में बदलाव को पकड़ सकती थीं. इस परीक्षण में पाया गया कि जब महिलाओं और पुरुषों को स्पेक्ट्रम के सातों रंग अलग-अलग करके दिखाए गए तो दोनों ने समान प्रतिक्रियाएं दीं. नीले रंग के लिए भी दोनों की प्रतिक्रियाएं समान थीं. वहीं जब इन रंगों को मिला-जुलाकर पेश किया गया तो महिलाओं ने लाल रंग के करीबी रंगों को वरीयता दी जबकि पुरुषों के वरीयता क्रम में नीले और हरे रंग आए. वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि महिलाओं में रंगों को पहचानने की क्षमता अधिक होती है इसलिए वे गहरे और स्थिर रंगों के अलावा चटक-चमकीले रंगों को भी अलग-अलग कर देख सकती हैं और उन्हें पसंद भी करती हैं.

इससे इतर, इस प्रयोग में शामिल 35 लोग (महिला और पुरुष) जो चीनी नागरिक थे उन्होंने लाल रंग को वरीयता दी. चीन में लाल रंग शुभ माना जाता है तो संभव है कि चीनी नागरिकों के इस चयन का कारण यही हो. इस आधार पर वैज्ञानिकों ने यह संभावना भी व्यक्त की कि महिला-पुरुषों के रंगों की पसंद को जैविक कारणों के साथ-साथ सामाजिक कारण भी प्रभावित कर सकते हैं.

बीते सालों में बच्चों और उनके रंगों के चयन का संबंध स्थापित करने के लिए सैकड़ों प्रयोग हुए हैं. इन सब से तकरीबन समान नतीजे ही मिले हैं. ये नतीजे बताते हैं कि कोई भी बच्चा, भले वह लड़का हो या लड़की, गुलाबी या नीले के बजाय तीन प्रमुख रंगों (लाल, हरा, नीला) की तरफ आकर्षित होता है. यहां पर यह अवधारणा कि गुलाबी हमेशा से जनाना और नीला हमेशा से मर्दाना रंग रहा है और ऐसा होने का कारण ह्यूमन बायोलॉजी है, एक बार फिर से गलत साबित होती है.

इन प्रयोगों के साथ-साथ पुरुषों और महिलाओं के रंगों के प्रति रुझान को समझने के लिए और भी प्रयोग होते रहे हैं लेकिन इनमें से किसी के आधार पर कोई एकतरफा नतीजा नहीं निकाला जा सका. फिर भी समाज में स्थापित सोच को इसके पीछे एक बड़ा कारण माना जाता है. इसके साथ ही रंगों के चयन करते हुए हम कई घटकों से प्रभावित होते हैं. कई बार हम रंगों को चुनते हुए अपनी पसंद पर दूसरे की पसंद को वरीयता दे देते हैं. पिछली बार कौन-सा रंग पहना था तो क्या प्रतिक्रियाएं मिली थीं, कौन-सा रंग किसी को आस-पास पहने देखा जो उस पर बहुत फब रहा था या हमारे आस-पास के ज्यादातर लोग किस रंग के कपड़ों को पहनते हैं, इन वजहों से भी हमारे रंग का चयन प्रभावित हो सकता है.

रंगों से जुड़ी इस सोच पर मार्केटिंग एक्सपर्ट नवीन चौधरी एक नई बात कहते हैं. वे बताते हैं कि बाजार भी रंगों के मनोविज्ञान के हिसाब से अपनी रणनीति तैयार करता है. इसमें उत्पाद बेचने वाले की दिखावट भी महत्वपूर्ण होती है. बाज़ार का मनोविज्ञान कहता है कि नीला रंग पहनने वाला ईमानदार और भरोसेमंद होने का प्रभाव पैदा करता है. नवीन के मुताबिक, ‘यही वजह है कि आपको मार्केटिंग, सेल्स या किसी कॉर्पोरेट से ताल्लुक रखने वाले लोग, विशेषकर पुरुष नीले रंग में रंगे दिखाई देते हैं. यह इस क्षेत्र का अघोषित नियम बन चुका है जिसे तोड़ने की हिम्मत हाल-फिलहाल किसी में नहीं दिखती.’

नवीन आगे बताते हैं कि बाजार गुलाबी रंग को महिलाओं के मातृत्व भाव से भी जोड़कर देखता है. वे कहते हैं, ‘अगर आप गुलाबी रंग पहनते हैं यानी कि आप अपनों की फिक्र करते हैं. गुलाबी रंग केयरिंग होना बताता है, ऐसा बाजार का मनोविज्ञान कहता है.’ बाजार के इस मनोविज्ञान के आधार पर कहा जा सकता है कि आपके रंगों का चयन जितना सामाजिक मान्यताओं से प्रभावित होता है उतना ही बाजार भी उसे प्रभावित करता है. विज्ञापन जगत के एक जानकार इसे दूसरे शब्दों में कहते हैं, ‘बाजार कभी रिस्क नहीं लेना चाहता. इसलिए वह हमेशा आपको आपके सामजिक परिवेश के हिसाब से चीजें उपलब्ध करवाता है.’ इस तरह से देखें तो लड़कों के लिए नीला और लड़कियों के गुलाबी रंग निश्चित करने के पीछे बाजार भी उसी परंपरागत सोच को मान्यता देता है जो कहती है – ऐसा तो होता ही है.

>> सत्याग्रह को ईमेल या व्हाट्सएप पर सब्सक्राइब करें

 

>> अपनी राय हमें [email protected] पर भेजें

 

  • हम अंतिम दिनों वाले गांधी को याद करने से क्यों डरते हैं?

    समाज | महात्मा गांधी

    हम अंतिम दिनों वाले गांधी को याद करने से क्यों डरते हैं?

    अपूर्वानंद | 05 जुलाई 2022

    आज हिंसा लगभग एक वैध और लोकप्रिय विधा बन गयी है जिसका मुक़ाबला केवल साहित्य कर सकता है

    समाज | कभी-कभार

    आज हिंसा लगभग एक वैध और लोकप्रिय विधा बन गयी है जिसका मुक़ाबला केवल साहित्य कर सकता है

    अशोक वाजपेयी | 26 जून 2022

    माइकल जैक्सन

    समाज | पुण्यतिथि

    गुलजार को ही नहीं, माइकल जैक्सन को भी चांद बेहद पसंद था!

    शुभम उपाध्याय | 25 जून 2022

    आज 48 साल की हो रहीं करिश्मा कपूर की पहली फिल्म ‘प्रेम कैदी’ देखना कैसा अनुभव है

    समाज | पहली फिल्म

    आज 48 साल की हो रहीं करिश्मा कपूर की पहली फिल्म ‘प्रेम कैदी’ देखना कैसा अनुभव है

    अंजलि मिश्रा | 25 जून 2022

  • शिखर से लेकर सबसे निचले स्तर तक अब हर राजनेता साहित्यकार और कलाकार है

    समाज | कभी-कभार

    शिखर से लेकर सबसे निचले स्तर तक अब हर राजनेता साहित्यकार और कलाकार है

    अशोक वाजपेयी | 19 जून 2022

    साहित्य कभी-कभार राजनैतिक भी हो सकता है पर वह हमेशा नैतिक रहता है

    समाज | कभी-कभार

    साहित्य कभी-कभार राजनैतिक भी हो सकता है पर वह हमेशा नैतिक रहता है

    अशोक वाजपेयी | 12 जून 2022

    क्या इस दौर की अकारण, अमानवीय, अभद्र और गैरकानूनी हिंसा का स्रोत कहीं हमारे साहित्य में है?

    समाज | कभी-कभार

    क्या इस दौर की अकारण, अमानवीय, अभद्र और गैरकानूनी हिंसा का स्रोत कहीं हमारे साहित्य में है?

    अशोक वाजपेयी | 05 जून 2022

    इतिहास के अपने मिथक होते हैं और मिथकों का भी इतिहास होता है

    समाज | कभी-कभार

    इतिहास के अपने मिथक होते हैं और मिथकों का भी इतिहास होता है

    अशोक वाजपेयी | 29 मई 2022