समाज | सिर-पैर के सवाल

प्यार दिल से होता है या दिमाग से?

विज्ञान ने प्यार की इस गुत्थी को सुलझाने की भी अपनी तरह से भरसक कोशिश की है

अंजलि मिश्रा | 06 फरवरी 2022

नोएडा के एक व्यस्त मॉल में हाथ में हाथ डालकर घूमते एक जोड़े के सामने जब यह सवाल रखा गया तो उनमें से एक ने दिमाग पर ज्यादा जोर दिए बिना एक बहुत सुना-सुनाया जवाब हमें दे दिया. जवाब कुछ यूं था – प्यार न दिल से होता है न दिमाग से, प्यार तो इत्तेफाक से होता है. उनका साथ दे रहीं मोहतरमा ने इस जवाब को थोड़ा और सुधारते हुए कहा – सच्चा प्यार तो इत्तेफाक के साथ-साथ किस्मत से ही होता है. इसके बाद हमने उनके जवाब को सहारा बनाते हुए अपनी पड़ताल आगे बढ़ाई कि आखिर प्यार दिल से होता है या दिमाग से?  

असल में जब अच्छी किस्मत के चलते आपके साथ कोई खूबसूरत इत्तेफाक होता है तो कोई आपको सिर्फ एक ही पल में पसंद आ सकता है. इसे ही पहली नजर का प्यार कहते हैं. ऐसा हम नहीं बल्कि वैज्ञानिक शोध भी कह रहे हैं. किसी को देखते ही दिमाग में एक साथ कई केमिकल रिएक्शन होते हैं जिससे कोई व्यक्ति प्यार में पड़ जाता है. इसे कुछ इस तरह से कहा जा सकता है कि पहली नजर पड़ते ही आपका दिल किसी पर नहीं आता बल्कि आपके दिमाग में कोई आ जाता है. यानी कहने को कुछ भी कहें पर प्यार की शुरुआत दिल से नहीं दिमाग से होती है.

न्यूयॉर्क की सिराक्यूज यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग ने इस विषय पर रिसर्च करते हुए पाया है कि प्यार में पड़ना न सिर्फ हमारी भावनाओं और हमारे मूड को बदल देता है बल्कि दिमाग के कुछ विशेष हिस्सों को भी सक्रिय कर देता है. जब कोई व्यक्ति प्यार में होता है तो उसका दिमाग डोपेमाइन, ऑक्सीटोसिन, एड्रेनलिन और वैसोप्रेसिन सहित आपको उत्साहित रखने वाले 12 हॉर्मोन्स का स्राव बढ़ा देता है. यही वजह है कि इश्क होते ही सबकुछ अच्छा और नया सा लगने लगता है, लोग अधिक ऊर्जावान महसूस करते हैं और कुछ लोगों का बेहतर व्यक्तित्व सामने आता है और अगर उनकी आदतें बिगड़ी हुई हों तो उनके सुधरने की संभावना भी इस समय सबसे ज्यादा होती है. इस शोध से, प्यार कभी भी, कहीं भी, किसी से भी हो सकता है, वाली धारणा भी सच साबित होती है. इस शोधपत्र में मात्र 0.2 सेकंड में ही प्यार होने की बात कही गई है.

सच यह है कि प्यार दिल से नहीं दिमाग से होता है लेकिन इसमें दिल की भी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता. इस सारे खेल का नियंत्रण दिमाग से होता है क्योंकि हॉर्मोन स्राव के लिए वही जिम्मेदार होता है. प्यार होने की सूरत में हॉर्मोन भी अपने नियमित व्यवहार से अलग असर दिखाने लगते हैं. उदाहरण के लिए एड्रेनलिन आमतौर पर किसी खतरे से पैदा हुए तनाव की प्रतिक्रिया के रूप में रिलीज़ होता है. लेकिन जब किसी से प्यार हो जाए तब भी यह सक्रिय हो जाता है. यही वजह है कि कई बार माशूक के सामने आने पर आशिक की हथेलियों पर पसीने आते हैं, तो कभी होंठ सूखने लगते हैं और दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है. इस स्थिति में एड्रेनलिन के कारण बेकाबू हुई धड़कनों का इल्जाम लोग निर्दोष दिल या महबूब को दे देते हैं.

प्रेमियों के आस-पास ‘तुमसे मिलने को दिल करता है’ वाला राग भी असल में दिल का नहीं डोपेमाइन हॉर्मोन का बजाया होता है. बाकी हॉर्मोन की तरह यह भी दिमाग से नियंत्रित होता है और दिल उस समय भी अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद खून को पंप कर रहा होता है. प्यार से जुड़ी हर इच्छा के लिए कोई न कोई हॉर्मोन जिम्मेदार होता है, जैसे परवाह करने की इच्छा ऑक्सीटोसिन और ताउम्र साथ रहने का इरादा वैसोप्रेसिन की वजह से बनता है.

जैवरसायनिकी के अनुसार प्यार में पड़ने के बाद इतने हॉर्मोनों के स्त्राव से दिमागी तंत्रिकाओं को सक्रिय करने वाले घटकों के स्तर में बढ़ोत्तरी हो जाती है. यह भी कहा जा सकता है कि दोनों बातें एक-दूसरे पर समान रूप से निर्भर करती हैं, यानी प्यार में पड़ने पर ही घटक सक्रिय होते हैं और इनके सक्रिय रहने की स्थिति में ही प्यार बना रह सकता है. और इसके लिए इंसान के पास एक अदद दिमाग (मस्तिष्क) होना अनिवार्य होता है क्योंकि प्यार दिमाग से ही होता है.

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