कोविड-19

विज्ञान-तकनीक | कोरोना वायरस

कोविड-19 की तीसरी लहर से हमें कितना डरने और सावधान रहने की ज़रूरत है?

कोरोना वायरस की तीसरी लहर का आना तय है लेकिन यह कितनी घातक होगी, यह अब भी हमारे हाथ में है

अंजलि मिश्रा | 05 अगस्त 2021 | फोटो: स्क्रीनशॉट

कई महीनों से कोविड-19 की दूसरी लहर का प्रकोप झेल रहे भारत के लिए जून का महीना इस लिहाज से अच्छा कहा जा सकता था कि इसकी शुरूआत संक्रमण के मामले घटने के साथ हुई थी. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिक सकी. जुलाई की शुरूआत के साथ ही कोविड-19 के अगले कहर के डर ने फिर अपनी जगह बनानी शुरू कर दी. जुलाई के दूसरे हफ्ते में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 की तीसरी लहर की शुरूआत की घोषणा कर दी थी. तीसरा हफ्ता आते-आते इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने भी कह दिया कि भारत में तीसरी लहर को नहीं रोका जा सकता है और यह बहुत जल्द यानी अगस्त में ही दस्तक दे सकती है. आखिरी हफ्ते की शुरूआत होते-होते रोजाना 40 हजार मामलों का आंकड़ा भी फिर सुर्खियां बटोरने लगा. हालांकि महामारी विशेषज्ञ तीसरी लहर का जिक्र करते हुए बार-बार यह दिलासा देते दिखते हैं कि यह पहली और दूसरी लहर जितनी विध्वंसक नहीं होगी लेकिन इसके साथ वे परिस्थतियों से जुड़ी कुछ शर्तें भी जोड़ देते हैं.

किसी घातक वैरिएंट के आने का खतरा कितना है?

तीसरी लहर के दौरान कोरोना वायरस के डेल्टा वैरिएंट, जिसे कोरोना वायरस बी.1.617.2 (B.1.617.2) भी कहा जाता है, को दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मई में वैरिएंट ऑफ कन्सर्न घोषित कर दिया गया डेल्टा वैरिएंट अब तक का सबसे तेज और संक्रामक कोरोना वैरिएंट बताया जा रहा है जो इसके मूल अल्फा वैरिएंट की तुलना में 60 फीसदी ज्यादा संक्रामक है. दिसंबर 2020 में भारत के 12 राज्यों में पाया गया यह वैरिएंट अप्रैल-मई में दूसरी लहर के दौरान 86 फीसदी ब्रेकथ्रू इंफेक्शन्स (वैक्सीन लगने के बावजूद होने वाला संक्रमण) की वजह बना था. बीते कुछ महीनों में यह नेपाल और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों समेत ब्रिटेन और अमेरिका में संक्रमण के मामले बढ़ाने की वजह बन चुका है.

डेल्टा वैरिएंट के वैश्विक चिंता बन जाने की वजह यह है कि यह कई वैक्सीनों के लिए मॉडरेटली रेजिस्टेंट पाया गया है. सरल शब्दों में कहें तो डेल्टा वैरिएंट शरीर में वैक्सीन द्वारा विकसित की गई एंटीबॉडीज को चकमा दे सकता है. ऐसा होने पर, वैक्सीनेशन के बावजूद संक्रमित होने की संभावना बढ़ जाती है. हाल ही में हुए शोध बताते हैं कि एस्ट्राज़ेनेका (कोवीशील्ड) और फाइज़र वैक्सीन के सिंगल डोज़ डेल्टा वैरिएंट के मामले में 33 फीसदी ही प्रभावकारी (यानी संक्रमण के खतरे को केवल एक तिहाई कम करने वाले) हैं जबकि अल्फा वैरिएंट के लिए ये टीके 50 फीसदी प्रभावी रहे हैं. वहीं, दो डोज़ लगाए जाने पर एस्ट्राज़ेनेका 60 फीसदी (अल्फा के लिए 66%) औऱ फाइज़र 88 फीसदी ( अल्फा के लिए 93%) प्रभावी हो जाती है. हालांकि फुल वैक्सीनेशन के बाद यह अंतर मामूली कहा जा सकता है लेकिन यह चिंता इस तथ्य को ध्यान में रखने पर बड़ी हो जाती है कि अब तक दुनिया की ज्यादातर जनसंख्या तक या तो वैक्सीन की पहुंच ही नहीं हो पाई है या फिर एक बड़े हिस्से को केवल एक ही डोज़ दिया जा सका है. यही वजह है कि दुनिया भर में तीसरी लहर की संभावना को वैज्ञानिक ‘अ पैंडेमिक ऑफ अनवैक्सीनेटेड’ (टीकाकरण से बाकी रह गए लोगों की महामारी) भी कह रहे हैं.

भारत में तीसरी लहर कब देखने को मिल सकती है?

महामारी से जुड़ी चेतावनियों में तीसरी लहर की शुरूआत का समय अगस्त से अक्टूबर के बीच बताया जा रहा है. तीसरी लहर के संभावित रुखों पर हाल ही में आईसीएमआर और इंपीरियल कॉलेज ऑफ लंदन ने मिलकर एक अध्ययन किया था. आईसीएमआर में ही महामारी विभाग के प्रमुख डॉ समीरन पांडा इस अध्ययन का हवाला देते हुए बताते हैं कि ‘तीसरी लहर अपने चरम तक पहुंचने में चार महीनों का समय लेगी और हो सकता है कि यह लगभग आधा 2022 का साल गुज़र जाने पर खत्म हो. जहां तक है, तीसरी लहर दूसरी जितनी घातक नहीं होगी लेकिन यह कई बातों पर निर्भर करता है. जैसे कि नैचुरल इंफेक्शन या वैक्सीनेशन द्वारा लोगों में इम्युनिटी विकसित होना, कोरोना वायरस के किसी नए वैरिएंट का उभरना या फिर सरकारों द्वारा प्रतिबंधों में ढील दिया जाना.’

ऐसे में पूछा जा सकता है कि जब संक्रमण के बाद विकसित होने वाली नैचुरल इम्युनिटी छह से नौ महीने तक रहती है और दूसरी लहर मई में ही अपने चरम पर पहुंची थी तो फिर तीसरी लहर इतनी जल्दी कैसे आ सकती है? डॉ पांडा इसका जवाब देते हुए बताते हैं कि ‘देश के अलग-अलग राज्यों में संक्रमण की दर अलग-अलग रही थी. सेकंड वेव के दौरान 80 फीसदी मामले केवल दस राज्यों से ही आ रहे थे. इसका मतलब है कि अभी एक बड़ी जनसंख्या ऐसी है जो इम्यून नहीं है और संक्रमण का शिकार बन सकती है. इसके अलावा, जब दिल्ली या महाराष्ट्र जैसी जगहों में बहुत ज्यादा मामले थे तो ज्यादातर राज्यों में लॉकडाउन लागू कर दिया गया था. चूंकि इन राज्यों में लॉकडाउन संक्रमण के मामलों के नियंत्रित रहने की एक बड़ी वजह थी इसलिए अब किसी भी तरह की ढील इन राज्यों में मामलों के तेजी से बढ़ने की वजह बन सकती है. ऐसा होने पर अगस्त में ही तीसरी लहर की शुरूआत देखने को मिल सकती है.’

तीसरी लहर कितनी गंभीर हो सकती है?

तीसरी लहर की गंभीरता की बात करें तो हाल ही में आईआईटी कानपुर की महामारी विशेषज्ञ टीम ने दूसरी लहर के आंकड़ों के आधार पर तीन अनुमान जारी किए थे. ये अनुमान लगाते हुए शोध टीम यह मानकर चलती है कि 15 जुलाई से देश भर में लॉकड़ाउन खत्म कर दिया गया है.

1) तीसरी लहर का पहला अनुमानित विवरण कहता है कि कोई भी प्रतिबंध न होने की सूरत में तीसरी लहर अक्टूबर में अपने चरम पर पहुंचेगी. तीसरी लहर के चरम आंकड़े दूसरी लहर से कम होंगे लेकिन फिर भी रोजाना आने वाले मामले 3.20 लाख तक पहुंच सकते हैं.

2) शोध टीम के दूसरे विवरण पर गौर करें तो यह कहता है कि कोई भी प्रतिबंध या लॉकडाउन न होने की सूरत में अगर कोई संक्रामक वैरिएंट भी उभरता है तो तीसरी लहर सितंबर में ही अपने चरम पर पहुंच सकती है. ऐसे में आंकड़ों की संख्या दूसरी लहर को भी पीछे छोड़ सकती है. शोधकर्ता इसे सबसे बुरी स्थिति बताते हुए रोजाना आने वाले मामलों की संख्या पांच लाख होने का अनुमान जताते हैं.

3) तीसरे विवरण में शोधकर्ताओं ने सभी ज़रूरी प्रतिबंधों के लागू होने की स्थिति में तीसरी लहर के चरम का समय अक्टूबर के आखिरी सप्ताह तक टलने की बात कही है. वे अनुमान लगाते हैं कि तीसरी स्थिति में रोज़ाना आने वाले मामलों की संख्या बुरी से बुरी स्थिति में दो लाख ही होगी.

डराने वाले इन अनुमानों से जुड़ी राहत की बात यह है कि इन्हें हासिल करने के लिए अपनाया गया मॉडल एसआईआर (ससेप्टिबल-इन्फेक्टेड-रिकवर्ड) बहुत सीमित जनसंख्या के आंकड़ों पर आधारित है. यह मॉडल क्लोज्ड पॉपुलेशन की बात करता है, यानी यह मानकर चलता है कि एक इलाके की जनसंख्या नियत है इसमें बाहर से आने-जाने वाले लोग या उस समय के जन्म-मृत्यु के आंकड़े शामिल नहीं है. साथ ही यह भी मानता है कि सभी वर्ग के लोगों के संक्रमण के चपेट में आने का खतरा बराबर है. इसके अलावा, इन अनुमानों में वैक्सीन लगवा चुके लोगों के आंकड़े भी शामिल नही हैं जो कि संक्रमणों की संख्या को प्रभावित करने वाला एक बड़ा फैक्टर है. जानकारों की मानें तो इन तमाम बातों का शामिल न होना यह अंदाज़ा दे देता है कि तीसरी लहर के दौरान दिखाई देने वाले आकंड़े आईआईटी की टीम के आंकड़ों से बहुत अलग होंगे. बल्कि, वे तो यहां तक कहते हैं कि असली आंकड़े अपेक्षाकृत कम होंगे.

एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने भी मीडिया से हुई बातचीत में कई बार कहा है कि अगर कोरोना वायरस से जुड़े सुरक्षा उपायों और प्रतिबंधों का पालन किया गया तो तीसरी लहर, दूसरी लहर से कम घातक साबित होगी. डॉ गुलेरिया जैसी ही बातें तमाम अन्य विशेषज्ञ भी दोहराते हैं. वे कहते हैं कि हो सकता है कि विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारत तीसरी लहर से कम ही प्रभावित हो लेकिन लापरवाही की स्थिति में यह कभी भी विकराल रूप ले सकती है.

क्या तीसरी लहर बच्चों को प्रभावित करेगी?

इस सवाल का सीधा जवाब है – नहीं. तीसरी लहर बच्चों को ही निशाना बनाएगी, इस धारणा की शुरूआत एक आलेख से हुई. कर्नाटक में कोविड-19 टास्क फोर्स के प्रमुख डॉक्टर देवी शेट्टी द्वारा लिखे इस आलेख में जिक्र किया गया था कि चूंकि केवल 18 साल से अधिक आयु वर्ग के लोगों को ही वैक्सीन लगाई जा रही है, इसलिए 18 से कम आयु वाले लोगों के संक्रमण से प्रभावित होने की संभावना ज्यादा होगी. डॉ शेट्टी का अपने आलेख में यह भी कहना था कि पहली लहर ने वरिष्ठ नागरिकों को प्रभावित किया था, वहीं दूसरी लहर के दौरान कामकाजी युवा वर्ग कोरोना की चपेट में आया था. अब ये दोनों ही आयुवर्ग संक्रमण या टीकाकरण के चलते इम्यून हो चुके हैं इसलिए अब कोरोना संक्रमण के ज्यादातर मामले बच्चों में देखने को मिलेंगे. ध्यान खींचने वाली बात यह है कि इसके पीछे उन्होंने किसी वैज्ञानिक शोध या अध्ययन का हवाला नहीं दिया था.

तीसरी लहर के दौरान बच्चों को ज्यादा खतरा होने की बात चर्चा में आने के बाद भारतीय बाल चिकित्सा अकादमी ने एक बयान जारी करते हुए कहा था कि ‘तीसरी लहर खास तौर पर बच्चों को ही प्रभावित करेगी, यह कहना गलत है. बच्चों से जुड़े 90 फीसदी से ज्यादा मामले लक्षण रहित और हल्के-फुल्के संक्रमण के ही रहे हैं. तीसरी लहर के दौरान भी बच्चों में गंभीर संक्रमण होने की आशंका बहुत कम है. अगर वयस्कों में संक्रमण के मामले बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं तो ही बच्चे इसकी चपेट में आ सकते हैं.’

क्या भविष्य में कोविड-19 की लहरों को आने से रोका जा सकता है?

कोरोना वायरस की तीसरी लहर का सामना करने और भविष्य में इसकी लहरों को आने से रोकने के लिए महामारी विशेषज्ञ सरकारों को स्थानीय स्तर पर रणनीति बनाने की सलाह देते हैं. चूंकि देश के अलग-अलग राज्यों में कोरोना महामारी की स्थिति बहुत अलग-अलग हैं, इसलिए जानकार सरकारों को इसकी पहचान कर हर जिले के हिसाब से तैयारी और बचाव के उपाय अपनाने का सुझाव देते हैं. इसके अलावा, नए वैरिएंट्स के उभरने जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए भी तैयार रहने की बात कही जा रही है. जानकारों का कहना है कि नए वैरिएंट्स के मामले बढ़ने पर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इससे जुड़े आंकड़े जारी करे, इस बारे में लोगों को जागरुक बनाए और मामलों में तेज़ बढ़त होने की स्थितियों के लिए ऑक्सीजन-वेंटिलेटर जैसी सुविधाओं का इंतजाम रखे. ऐसा न हो पाने की सूरत में वे स्थितियों के दूसरी लहर से भी ज्यादा गंभीर हो जाने की आशंका जताते हैं.

भविष्य में और लहरों से बचने से जुड़ा एक मुख्य सुझाव टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाए जाने का है. विश्व भर की सरकारों को इसे पहली प्राथमिकता बनाए जाने का मशविरा दिया जा रहा है. भारत में भी टीकाकरण के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को जागरुकता अभियान चलाने और वैक्सीन की सप्लाई सुनिश्चित करने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाने की ज़रूरत बताई जा रही है. दुनिया भर के जानकारों का कहना है कि केवल और केवल वैक्सीनेशन ही विश्व को कोरोना से निजात दिला सकता है.

कोरोना महमारी से निपटने के लिए विशेषज्ञों का अगला सुझाव, जनता और सरकारों दोनों के लिए है. जानकार कहते हैं कि जब मामले कम हों तब आर्थिक गतिविधियों को शुरू किए जाने की तरफ ध्यान दिया जाना चाहिए लेकिन ऐसा करते हुए सुरक्षा उपायों को बरतना बेहद जरूरी है. लॉकडाउन के खुलने का मतलब यह न समझा जाए कि स्थितियां अब सामान्य हो चुकी हैं. भीड़ भरे बाज़ारों और आयोजनों पर अब भी सरकार कुछ पाबंदियां लगा सकती है. वहीं, आम लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे खुद भी भीड़ भरी जगहों पर जाने से बचेंगे और सार्वजनिक जगहों पर मास्क लगाने या सोशल डिस्टेंसिंग जैसी शर्तों का पालन करेंगे. कुल मिलाकर, इससे यह अंदाज़ा लगता है कि तीसरी या अगली लहरों से बचने के लिए आने वाले समय में हालात सामान्य होते दिखने पर भी हमें कम से कम मास्क और सैनिटाइजर के इस्तेमाल जैसी आदतों को अपनाए रखना होगा.

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